Friday, 25 November 2011

Live by Ethics not by Rules





गांधीजी ने नमक कानून तोडा, मार्टिन लूथर किंग  (जू) ने रंगभेद नीती के कानून तोड़े, राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा का विरोध किया, दलाई लामा चीन की तिब्बत पर प्रभुसत्ता स्वीकार नहीं करते और आन सां सू की बर्मा की सरकार को सरकार ही नहीं मानती तो क्या ये सारे लोग ईमानदार, निष्ठावान और सद्चरित्र नहीं है?  सच तो यह है की इन लोगो ने नियमों की बजाय नैतिक मूल्यों पर अपना जीवन जीया और उदाहरण बन गए.

सच तो यह है की नियम-कानून बनाए ही इसलिए जाने चाहिए जिससे देश- समाज में नैतिक मूल्यों की रक्षा की जा सके बिलकुल उसी तरह जिस तरह परिवार में माता-पिता अपने बच्चों में अच्छे संस्कार के लिए घर में अनुशासन का वातावरण बनाते है.
वास्तव में व्यक्ति और सभ्यता के विकास के साथ- साथ नियम प्रथाएं भी अप्रासंगिक होने लगती है जिन्हें देश-समाज की बेहतरी के लिए बदल दिया जाना नितांत जरुरी हो जाता है. उदाहरण के तौर पर आपको याद दिला दूँ कि कुछ सालों पहले तक अमेरिका में गुलामों को रखना वैधानिक था और आज़ादी के बाद भी वहां महिलाओं को मतदान का अधिकार नहीं था.

लेकिन व्यावहारिक जिन्दगी में सामान्य व्यक्ति क्या करें?
 न तो उसके लिए देश के कानून और समाज कि प्रथाओं को बदल सकना संभव है और न ही वो जीवन-भर किसी आन्दोलन का इंतज़ार कर सकता है.

उसे तो बस यह निश्चय भर करना है कि वो अपना जीवन नैतिक मूल्यों के आधार पर जीयेगा वैसे तो ऐसा करते हुए वह स्वतः ही नियमों कि पालना कर रहा होगा लेकिन फिर भी यदि कोई नियम उससे नैतिक मूल्यों कि अवहेलना करवाता है तो यह उसका नैतिक अधिकार है कि वह उन नियम प्रथाओं को न मानें. ऐसा करते हुए वह एक क्षण के लिए भी अपने मन में ग्लानि भाव न रखे क्योंकि वह तो ईमानदारी और सद्चरित्रता के ऊँचे मापदंडों को छू रहा होगा.

उसे इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना होगा कि वह अपनी मान्यताओं का अनावश्यक प्रचार न करें. ऐसा करने पर सामयिक व्यवस्था उसे दोषी ठहरा देगी एवं वह सजा या भर्त्सना पाकर अपने और अपने परिवार के लिए मुसीबतें खड़ी कर देगा. वह तो अपने आपको जितना हो सके उस परिद्रश्य से परे हटा लें और यदि एक हद से ज्यादा यह संभव नहीं है तो उचित सामंजस्य बिठा लें. सिर्फ सामंजस्य,समझौता नहीं. वहां भी वह अपनी निजता व मूल्यों कि रक्षा करें. यदि वह ऐसा करता है तो प्रकृति अपने आप उसको ऐसे अवसर देगी जिससे वह अपने जीवन के परिद्रश्य को बदल सके; जहाँ उसके लिए नैतिक मूल्यों पर चलना न केवल आसान हो बल्कि जहाँ इसके लिए उसे उचित प्रशंसा और पुरस्कार मिले.

आइए हम सब मिलकर मूल्यों पर आधारित समाज कि रचना में अपना हाथ बटाएँ;
आपका,
राहुल.....

Friday, 18 November 2011

Re - Create Yourself

                                                                      हरदम , जब कभी ; बस निकल लें,
                                                                      थोडा  - सा  आराम करें
                                                                      और तब
                                                                      जब आप लौटेंगे काम पर
                                                                      आपके निर्णय होंगे ज्यादा पक्के
                                                                      बिना विश्राम कैसे रहेगा
                                                                      आपके निर्णयों में पैनापन

                                                                      थोडा दूर निकल जाएँ
                                                                      काम दिखेगा छोटा-सा
                                                                      और उससे भी ज्यादा
                                                                      दिखेगा पूरा का पूरा
                                                                      और तब
                                                                      चल जाएगा तुरंत मालूम
                                                                      कहाँ अनुपात गड़बड़ा रहा है
                                                                      कहाँ  लय टूट रही है
                                                                                                    -लेओनार्दो  दी विन्ची

                                                                                                                                       लेओनार्दो दी विन्ची; महानतम चित्रकार, पुनर्जागरण के प्रणेताओं में से एक और सबसे अहम् इतिहासकारों द्वारा ठहराए गए आज तक के सबसे बड़े जिज्ञासु.
ऐसे व्यक्ति जिनकी खोजबीन से जिन्दगी का कोई कोना छूटा हो ऐसा नहीं लगता. जिन्होने पहली विमान-उड़ान के 400 वर्ष पहले इसकी संभावनाओं को तलाशा. उनके जीवन को देखकर तो ऐसा लगता है की कोई व्यक्ति एक ही जीवन में इतना कुछ कैसे कर सकता है.
जब ऐसा व्यक्ति हमें रुकने की, सुस्ताने की सलाह देता है तो निश्चित रूप से इसका महत्व तो है.

वे हमें इस सुंदर कविता के द्वारा यह कहना चाहते है की रोजमर्रा की जिन्दगी जीते जीते हमारी रचनात्मकता क्षीण होने लगती है. हम अपने काम को करते-करते काम में कम और समय सीमाओं में ज्यादा उलझ कर रह जाते है. कितने बजे उठना है, कितने बजे काम पर जाना है, कितने बजे खाना खाना है और कितने बजे सोना है, इत्यादि.

वहीँ रचनात्मकता तो मन की उपज होती है और मन को समय की समझ नहीं होती. हम मन के क्रिया- कलापों को घडी से बाँधने लगते है. यह भी ठीक है कि समय में उलझ जाना सामान्यतया हमारी मज़बूरी होती है क्योंकि हमारा दिन एक के बाद एक दायित्वों से बंधा होता है. समय कि इन सीमाओं को निबाहते निबाहते हम अनजाने ही यह भूलने लगते है कि किसी काम को करने या न करने का चुनाव हमारा नैसर्गिक अधिकार है और हमारी अभिव्यक्ति का मूल. अवकाश हमारे मन को समय के बंधनों से मुक्त कर हमारे निर्णयों को पक्का करता है और हमारी रचनात्मकता लौटता  है.

एक और पहलू जो हमारी रचनात्मकता को धुंधली करने लगता है वह है सांसारिक नकारात्मकता. हमारा काम कभी एक पक्षीय नहीं होता और जिन्हें ये प्रभावित करता है वे हमें नियंत्रित करने कि कोशिश करने लगते है. ऐसा हम भी करते है और वे भी. हम सभी यह कोशिश करने करने लगते है है कि हर व्यक्ति अपना काम हमारे तरीके से करें. यह रस्साकशी अहम् के हाथों में चली जाती है और हमारा काम जो प्रेम कि अभिव्यक्ति होना चाहिए अहम् कि लड़ाई का मैदान हो जाता है. इस सारी उठापटक में हमारा मन खंडित होने लगता है. मन कि दीवारों पर तरेड़ें (cracks) आने लगती हैं.

अवकाश मन कि मरम्मत करने का समय होता है. उसे ताज़ा और सुंदर बनाने के लिए होता है. अंग्रेजी का शब्द (Re - create) बिलकुल सार्थक है. अवकाश मन को पुनः सर्जित करता है. इस समय हम अपने काम को निर्र्विकारभाव के साथ समग्रता से देख पाते है और तब ही जान पाते है कि काम के किस भाग को हम जरुरत से अधिक या कम महत्व दे रहे है और कहाँ हमारे जीवन कि लयात्मकता (Rhythm) टूट रही है.

हमारा काम हमारा परिचय बनें, इन्ही शुभकामनाओं के साथ;
आपका
राहुल.....

Monday, 31 October 2011

Deepawali

दीपावली पर दिल से ढेरों शुभकामनायें.

दीपावली यानि दीपों कि अवली यानि दीपों कि पंक्ति. दीपावली अमावास के दिन आती है. अमावास जो अन्धकार का प्रतीक है. अन्धकार जिसका नाम आते ही डर और निराशा ध्यान आते है लेकिन दीपों कि रोशनी इस अमावास को ऐसा बना देती है कि पूर्णिमा भी लजा जाए.

दीपावली का यह पावन त्यौहार रूपक है हमें वापस याद दिलाने के लिए कि हमें अपने मन के अन्धकार को मिटाने  के लिए भी जागृति (Awareness) का दीपक लगाना होगा. अन्धकार चाहे कितना ही घना क्यूँ न हो,कितना ही फैला क्यूँ न हो बस रोशनी कि एक किरण ही काफी होती है.

और फिर जीवन - पथ  के हर पायदान पर हम जागृति का दीपक लगाते जाएँ हमारा हर दिन खुशियों की रोशनी से भर जाएगा.
यही ईश्वर से मेरी प्रार्थना है.

उत्सव मनाने के लिए अवकाश चाहिए, मुझे भी अगले सप्ताहांत की अनुमति दे. चलिए, फिर हम अपने क्रम को इसी विषय से पुनः शुरू करेंगे की जीवन में  अवकाश क्यों और कितना जरुरी है.

आपका
राहुल.....

Monday, 24 October 2011

We Are Enough


मैंने पिछले कुछ दोनों से अपनी ही एक ऐसी आदत को पकड़ा है जो मुझे ही बहुत परेशान किए रखती है. मैंने पाया कि में कुछ भी करता हूँ तो दिमाग के एक कोने से आवाज़ आती है कुछ कमी रह गयी, थोडा और कर लेते या ऐसे नहीं वैसे कर लेते तो ठीक रहता.

मैंने महसूस किया कि मेरी यह आदत मुझे कभी अपने किए का आनंद उठाने नहीं देती थी. मैंने जब यह बात अपने दोस्तों से साझा कि तो अधिकतर का यह मत था कि ऐसा ही होना चाहिए क्योंकि मन कि असंतुष्टि हमें  आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा देती है. ये हुई दुविधा. क्या आगे बढ़ने के लिए असंतुष्ट बने रहना ज़रूरी है?  क्या स्वयं को कमतर महसूस कर हम अपने व्यक्तित्व को सुंदर बना सकते है?

मेरे मन में सवालों कि यह रेलगाड़ी चली तो मैंने अपने काम - व्यवहार को समग्रता से देखने कि कोशिश की और तब पाया कि ऐसे बहुत से लोग है जो मुझे पसंद करते है मैंने इन लोगो कि सूची बनाई तो पाया कि मेरे दृष्टिकोण को नकारने वालों कि संख्या तो दो- चार ही है जबकि सराहने वालों कि कहीं अधिक. इस बात ने मेरे अंतस को शांति से भर दिया.

वास्तव में हम अपना मूल्यांकन दूसरों के तय किए मापदंडो पर करते है लेकिन यह भूल जाते है कि हमारे जीने का अंदाज़ अलग होना स्वाभाविक है. शायद ईश्वर ने हम सभी  को अलग - अलग चेहरे यही बात याद दिलाने के लिए दिए है.

कुछ हद तक हमारी पारंपरिक परवरिश भी इसके लिए जिम्मेदार है. सामान्यतया हम सब ही अपने बच्चों को यह तो बताते है कि क्या गलत है और क्या सही लेकिन कभी उनके मन में क्यों का जवाब नहीं देते. यह भी  तब जब बच्चे कुछ कर चुके होते है. यही से नींव पड़ती  है इस आदत की कि हमारे काम का मूल्यांकन काम करने के बाद कोई और करेगा. इससे अनजाने ही हम किसी काम को करने के बाद संदेह कि निगाह से देखने लगते है कि हमने ठीक किया या नहीं.

धीरे- धीरे हमारा जीवन 'चाहिए शब्द {may, might, could, would, must} चलाने लगता है और इस तरह हम असंतुष्ट रहने लगते है.
जब हम अपनी ज़िन्दगी के निर्णय स्वयं लेने लगते है तब भी अपना मूल्यांकन दूसरो के मापदंडो के आधार पर क्यों करते है? क्यों नहीं अपने मूल स्वभाव पर लौट आते? वो इसलिए क्योंकिं प्रेम हमारी प्रकृति है और इस आदत कि जड़ प्रेम पाने कि लालसा में है, जिनसे हम प्रेम करते है उनकी नज़रों में स्वीकार्य होने कि इच्छा में है. कोई हमें सम्पूर्णता से स्वीकारे इसके लिए सबसे पहले हमें अपनी सम्पूर्णता को स्वीकारना होगा.

हम अपने जैसे ही हो सकते है किसी और के जैसे नहीं इसलिए हम अपने काम को अपने स्वभाव के पैमाने पर मापें.

निस्संदेह हम अपने आलोचकों कि सुने, उन्हें  अपनी कसौटी पर समय, काल और परिस्थिति के परिप्रेक्ष्य  में कसे  और फिर सही पाए तो ज़रूर अपनाए और अपने इस गुण को भी अपनी सम्पूर्णता का हिस्सा माने.

संतुष्ट जीवन कि मंगल कामनाओ के साथ,

आपका

राहुल ............

Monday, 17 October 2011

Violence - Last resort

हमारे देश के स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास ने मुझे शुरू से ही उद्वेलित किया है. हमारे स्वतंत्रता आन्दोलन कि मुख्य धारा अहिंसात्मक थी जिसका नेतृत्व किया था हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने. स्कूल के शुरूआती सालों में मुझे स्वतंत्रता आन्दोलन का इतिहास किसी चमत्कार से कम नहीं लगता था लेकिन फिर जैसे जैसे बालगंगाधर तिलक, सुभाष चन्द्र बोस, लाला लाजपतराय  कि आन्दोलन में भूमिका को पढ़ा जहाँ में उलझन बढ़ती चली गई.

निश्चित रूप से गांधीजी का अहिंसात्मक आन्दोलन और उसके परिणाम किसी चमत्कार से कम नहीं है और किस तरह अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए अहिंसात्मक तरीके से लड़ कर इन्हें हासिल किया जा सकता है इसका जीवंत उदाहरण है गाँधी-दर्शन और हमारे स्वतंत्रता आन्दोलन का इतिहास.

मेरी उलझन न तो यह हे कि अपनी स्वतंत्रता में किस कि भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण थी या कौन सा रास्ता ज्यादा सही था बल्कि मेरी उलझन तो यह है कि अपनी स्वतंत्रता और जीने के मूल अधिकारों कि रक्षा करने के लिए अहिंसात्मक रास्ते पर चलते-चलते क्या जीवन में कई बार हम उस बिंदु पर नहीं पहुँच जाते जहां हिंसा जिसे युद्ध कहना चाहिए एकमात्र रास्ता बच जाता है ? क्या हमें इस बिंदु पर पहुंचकर भी अहिंसात्मक बने रहना चाहिए चाहें कोई व्यक्ति या व्यवस्था अपने फायदे के लिए हमारी स्वतंत्रता और अधिकारों का हनन करे या हमारे विचारों और सिद्धांतों को हमारी कमजोरी समझे ?

मुझे सुलझन का सिरा मिला शरीर-विज्ञानं में. शरीर कि किसी व्याधि का उपचार मेडिसिन से हो या सर्जरी से इसका निर्णय डॉक्टर इस आधार पर करता है कि शरीर का वो हिस्सा पुनर्जाग्रत होने कि स्थिति में है या नहीं. बस बिलकुल इसी तरह यदि कोई व्यक्ति या व्यवस्था अहिंसा के सारे रास्ते अपनाने के बाद भी हमारी स्वतंत्रता और जीने के मूल अधिकारों पर अतिक्रमण करें या जान बूझकर अपने फायदे के लिए विलम्बित करें तो फिर उसका नष्ट हो जाना ही शुभकर है.

हिंसा के इस रचनात्मक उपयोग में डर सिर्फ इस बात का लगा रहता है कि यह कठोर अनुशासन और ऊँचे दर्जे का विवेक मांगती हैं. किसी भी व्यक्ति या व्यवस्था को नष्ट करना या होने देना तब ही शुभकर हो सकता है जब कि उसका नष्ट हो जाना शेष समाज को बचाने के लिए अंतिम विकल्प हो.

गीता ने इसे धर्मयुद्ध कहा है. धर्मयुद्ध न तो हार-जीत के लिए लड़ा जाता है और न ही किसी व्यक्ति-विशेष के खिलाफ; इसका  उद्देश्य तो उन धारणाओं और व्यवस्थाओं को बदलना होता है जो हमारी स्वतंत्रता और जीने के मूल अधिकारों का हनन कर रही होती है.

यानि किसी व्यक्ति, वस्तु,  स्थिति या विचार को नष्ट न होने देना चाहे  उससे सम्पूर्ण समाज संक्रमित हो जाये कभी उचित नहीं हो सकता. समाज को संक्रमित होने से बचाने के लिए अंतिम विकल्प के रूप में कि गई हिंसा भी अनुचित नहीं हो सकती.

जियो और जीने दो कि इसी भावना के साथ ;
आपका
राहुल.....

Monday, 10 October 2011

Ego is essential

दुनिया में कुछ भी अपनी सम्पूर्णता में अच्छा या बुरा नहीं होता. अहम् के बारे में भी मेरा ऐसा ही मानना है. हमारा जीवन हमारे द्वारा किए गए चुनावों का नतीजा होता है. इस क्षण में हम क्या करने का चुनाव करते है यह ही निश्चित करता है कि अगले क्षण के लिए प्रकृति हमें चुनाव के लिए क्या-क्या विकल्प देगी. यही जीवन है.
इस क्षण को हम कैसे जियेंगे इसका निर्णय हमें अंतरात्मा कि आवाज़ पर करना होगा. अंतरात्मा कि आवाज़ जिसे हम मन कि इच्छा, inner calling, intution, दिल कि आवाज़ जैसे नामों से पुकारते है.

एक ही क्षण में, समान परिस्थितियों में एक बच्चा फुटबॉल खेलना चाहता है तो दूसरा कोई पहेली सुलझाना चाहता है. दोनों ही बच्चों के निर्णय न तो सही है न गलत बस अपने-अपने है. दोनों ने ही वो किया जो उनका मन किया और वह ही दोनों के लिए ठीक भी है.
हमारे लिए क्या ठीक है यही स्व को पहचानना है एवं स्व कि पहचान ही तो हमारा अहम् है, यानि अहम् उतना भर जरुरी है जिससे हम इस क्षण को कैसे जियें इसके लिए उपलब्ध विकल्पों को जानकार उनका विश्लेषण कर सकें तब ही तो हम यह तय कर पाएंगे कि इस क्षण को जीने का कौनसा अंदाज़ हमें सच्चे अर्थों में अभिव्यक्त करेगा.

अहम् स्व कि पहचान (self-knowing) है यह अहंकार  (false-self)  में नहीं बदलना चाहिए; जैसा कि सामान्यता हो जाता है और हम अपनी और अपनों कि जिन्दगी खराब कर लेते है. हम परमात्मा कि स्वतंत्र भौतिक अभिव्यक्ति है और यही हमारी पहचान है, न कि हमारी सांसारिक उपलब्धियाँ. अभिव्यक्ति कि इस स्वतंत्रता और निजता को बनाए रखना ही हमारा अहम् है और उतना ही जरुरी भी. अहम् कि भावना जैसे ही बढ़ती है यानि जैसे ही हम अपनी पहचान सांसारिक उपलब्धियों से बनाने लगते है हमारा यही गुण हमारे लिए विनाशकारी हो जाता है.

हम अपनी और अपनों कि निजता का सम्मान करें और जिन्दगी के हर क्षण को अपनी सुगंध से भर पायें ; दिल से इन्ही शुभकामनाओं के साथ,

आपका
राहुल.....

Sunday, 2 October 2011

Let us be touched by life

जिन्दगी का अर्थ ही अनुभूति और अभिव्यक्ति है या यों कह लें जिन्दगी के हर लम्हे को महसूस करना और उसे अपने अंदाज़ में जीना; तब भी जब समय हमारी इच्छाओं के अनुरूप हो और तब भी जब समय विपरीत हो. दुनिया में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जिसके जीवन में ऐसा समय न आया हो जब उसने सोचा न हो कि 'अब क्या होगा?' ' अब कैसे होगा?' जब उसे लगा हो कि जीवन ठहर सा गया है. जब उसे जीवन के उस पार दिखाई ही न दे.

जिन्दगी में कुछ  दुःख ऐसे होते हैं जिन पर हमारा कोई बस नहीं चलता और कुछ मुश्किलें ऐसी होती है जो हमें उन पहलुओं कि तरफ इशारा कर रही होती हैं जिन्हें हम  जाने-अनजाने अनदेखा कर रहे होते है. चाहे जो भी हो मुश्किलों से गुजरकर ही और दुःख में भीगकर ही जीवन के उस पार जाया जा सकता है. हर दुःख और हर मुश्किल हमें वो पाठ  पढ़ाने को आती है जिन्हें सिखाने के लिए हमने जिंदगी कि इस पाठशाला में प्रवेश लिया है.



मेरे जीवन  कि दूसरी बड़ी दुखद घटना जब अचानक से मम्मी चल बसी. रात के ११ बजे  का समय था. सब रिश्तेदार इकठ्ठा हो रहे थे लेकिन में सकपकाया था;कुछ भी समझ नहीं पा रहा था कि क्या हुआ. दो-तीन घंटे  लगे मुझे  स्थिति को स्वीकार करने में और तब मेरी रुलाई फूटने लगी. मैं उन क्षणों को उनकी गहराई से महसूस करने लगा और मेरा मन रोकर उनको व्यक्त कर देना चाहता था लेकिन जैसे ही मैं रोने को होता मेरे एक रिश्तेदार 'हिम्मत रखो' , 'आपको ही संभालना है.' कहकर चुप करा देते. आज भी व क्षण कुछ ठहरे से लगते है. आज भी लगता है कि दिल के किसी कोने में  कुछ  अव्यक्त सा पड़ा है.

दुःख और मुश्किलों से हम जितना भागते है उतना ही वे हमारा पीछा करती है और जैसे ही हम उनका सामना करते है वे हमें जीना  सिखाने लगती है. जितनी नाजुक ये संवेदनाएं है उतनी ही सावधानी इन्हें सँभालने में बरतनी पड़ेगी. हमें हर हाल में सचेत रहना है कि हम न तो अपने दुःख और मुश्किलों का कारण किसी व्यक्ति-परिस्थिति में ढूंढें  और न ही इससे अपनी कोई छवि ही  गढ़ लें. हमारा अहम् हमें इस दौरान बार-बार इस रास्ते पर ले जाने कि कोशिश करेगा लेकिन हमें अपने आपको रोकना होगा. अनुभूति की गहराई  और अभिव्यक्ति कि सच्चाई ही जीवन को सार्थक बनाएगी.

जीने कि कला संवेदनाओं से पीछा छुड़ाने में नहीं है अपितु अपने हर पहलु का जिन्दगी के साथ तारतम्य बिठा कर अपनी विशिष्टता पर आनंदित होने में है.
हम इस जीवन को इसकी सम्पूर्णता के साथ जी पायें; इन्ही शुभकामनाओं के साथ.

आपका
राहुल.....