Friday, 27 April 2012

मन का विज्ञान




जिस दिन हमारा मन ठीक होता है उस दिन सारे कम कम प्रयासों में भी समय पर होने लगते है. वे लोग भी अनायास मिल जाते है जिन्हें ढूंढ़ पाना और मिल पाना पिछले काफी समय से मुश्किल हो रहा था. यहाँ तक कि उस दिन ट्रैफिक भी कम मिलता है, सिग्नल भी खुले और पार्किंग भी आसानी से. 

क्या आपने कभी गौर किया है ऐसा क्यूँ होता है? 
हमारा मन विचारों से बनता है. हमारे विचार उर्जा - पुंज होते है जिनकी अपनी तरंगीय आवृतियाँ (वाइबरेशनल फ्रिक्वेन्सी) होती है. भौतिकी के अनुसार समान तरंगीय आवृतियाँ ही एक दूसरे के प्रति आकर्षित होती है. यही कारण है कि हमारी दुनिया भी वैसी ही होती है जैसी हमारी सोच होती है.हम अपने जीवन में उन व्यक्तियों, घटनाओं और स्थितियों यहाँ तक कि वस्तुओं को ही अपनी और आकर्षित करते है जो हमारे वैचारिक स्तर से मेल खाती है. दूसरे शब्दों में, हमारे आस - पास कि दुनिया हमारे विचारों का ही प्रतिबिम्ब होती है.

जब कभी हम व्यक्ति, घटना या स्थिति से नाखुश होते है तो अधिकांशतः उनमें अपनी ही किसी कमजोरी का प्रतिबिम्ब देख रहे होते है. हमारा अहम् हमारी कमजोरियों को दूसरे पर लाद देता है हर बात में अपने आपको बेहतर सिद्ध करना ही अहम् कि प्राण - वायु है. इस तरह हम अपने को सही सिद्ध करने के लिए अपनों से तर्क - वितर्को में उलझ रिश्तों में कडवाहट भर लेते है. क्रोध इसीलिए हमारी कमजोरी होता है. यदि हम पूरी ईमानदारी से सूची बनाएँ कि हमें दूसरों में क्या - क्या अच्छा लगता है और क्या - क्या बुरा तो पाएंगे कि जो - जो हमें बुरा लगता है अधिकांशतः वे हमारी ही कमज़ोरियाँ है. ऐसी कमज़ोरियाँ जिन्हें हम  इतना नापसंद करते है कि उनका हममें होना हम स्वीकार नहीं कर पाते और इसलिए दूसरों पर लाद देते है. 

इसका कतई यह मतलब नहीं है कि हर बात के लिए स्वयं को दोषी ठहरा अपने आपको ग्लानी से भर लें. हमेशा दूसरों कि गलतियों को नजर अंदाज कर स्वयं को दोषी ठहराना तो उस ईश्वरीय भेंट का अपमान करना होगा जो हमें अच्छे - बुरे के भेद कर पाने कि समझ के रूप में मिली है. तो फिर यह पकड़ में कैसे आए कि कहाँ हमें अपने विचारों को संभालना है और कहाँ दूसरों से दूरी बना लेनी है? 
इसके लिए थोडा निष्ठुर हो अपनी ही मनः स्थिति कि जांच - पड़ताल करनी होगी.यदि हमारा मन इसलिए विचलित है कि हम किसी व्यक्ति से बेहतर सिद्ध होने कि उत्तेजना से भरे है या इसलिए कि कोई घटना - स्थिति हमारी मनचाही नहीं है तो निश्चित रूप से हमें अपने विचारों को सँभालने कि जरुरत है. यही है दूसरों अपनी कमियों का प्रतिबिम्ब देखना. यदि हम किसी व्यक्ति, घटना या स्थिति को निरपेक्ष भाव से देखते है और अनुचित पाते है तो हमारी कम ठीक मनः स्थिति जायज है. 

इस तरह हम सभी अपने विचारों से एक दूसरे को प्रभावित करते भी है और होते भी है. कई बार किसी व्यक्ति कि उपस्थिति मात्र से हम अपने आपको ज्यादा शांत और स्थिर महसूस करने लगते है जबकि कुछ लोगो का साथ हमें नकारात्मकता से भर देता है और हम ऐसा व्यवहार करने लगते है जैसी वे हमसे अपेक्षा रखते है. यह उन लोगो से प्रवाहित होने वाली ऊर्जा है जो हमें शांत और अशांत कर देती है और इसीलिए सत्संग का महत्व है. सत्संग यानि सत का संग. श्रेष्ठ का संग. अपने आप को अच्छी सोच वाले लोगो के बीच रखना ही सत्संग है.

अच्छी सोच रखना और अच्छी सोच वाले लोगो के बीच रहना ही बेहतर जिन्दगी का मूलमंत्र है.


(रविवार, 22 अप्रैल को दैनिक नवज्योति में ' बेहतर जिन्दगी का मूलमंत्र - अच्छी सोच के लोगो का साथ' शीर्षक के साथ प्रकाशित)



आपका 
राहुल..




Saturday, 21 April 2012

विचारों का रास्ता मंजिल का पता



हमारे विचार शब्द बनाते है
हमारे शब्दों से कर्म बनते है
        कर्म   से   आदतें   बनती   है
         आदतें हमारा चरित्र बनती है 
       और 
हमारा चरित्र हमारी मंजिल तय करता है.


दुनिया में जो कुछ भी दिख रहा है वह किसी न किसी के विचारों का ही परिणाम है. विचारों की प्रकृति और शक्ति पर बात करने से पहले अहम् बात यह है की हम विचारों के अस्तित्व को स्वीकारें. हमारे विचार भी दूसरी वस्तुओं की तरह होते है जिनके अपने गुण - धर्म होते है लेकिन ये तब तक अप्रभावी रहते है जब तक इनसे हमारी भावनाएं नहीं जुड़ जाएँ. भावनाएं विचारों को गति देती है जिससे हमारी जीवन - परिस्थितियों का निर्माण होता है. हमारी परिस्थितियाँ हमारे भावपूर्ण विचारों की देन होती है.

हमने कई बार आपस की बात में एक दूसरे से कहते सुना है, ' तू, ऐसा मत सोच, सोचते है जो सही हो जाता है.'  यह धारणा हमें हमेशा डराए रखती है. एक तरफ तो हम धर्म, समाज और संस्कारों से पैदा भय के वातावरण में रहते है जिस कारण मन में हमेशा अनिष्ट की आशंका बनी रहती है दूसरी तरफ यह डर की ऐसा कुछ सोच भी लिया तो सच हो जायेगा. यह बात सही है लेकिन अधूरी. यदि हम कुछ सोचे जिसका होना हमारा अंतस स्वीकार कर ले और हम उसके लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाएँ तब ही हम सोचे वह होता है. मन का कोई ख्याल जो डर से जन्मा है और हम अपनी पूरी इच्छा - शक्ति से उसे नहीं होने देना चाहते तो वह ख्याल शक्ति - हीन है और उसके हो जाने की कोई सम्भावना भी नहीं. आप ही बताइये कौन - सा विधार्थी होगा जिसका परीक्षा - भवन में जाने से पहले जी न घबराता होगा ?

हम अपनी असफलताओं का घड़ा परिस्थितियों के माथे फोड़ खुद को बरी कर लेते है जबकि किसी भी परिस्थिति के पीछे की घटनाओं की बारीकी से जांच - पड़ताल करें तो पायेंगे की ये हमारे भावपूर्ण विचार ही थे जिन्होंने हमें इन परिस्थितियों में ला खड़ा किया. परिस्थितियों के निर्माता होने का यह अहसास हमें नयी उर्जा से भर देगा. अब हम केवल उन विचारों को भाव देंगे जिन परिस्थितियों को हम अपने जीवन में चाहते है. इस तरह भाग्य पुरुषार्थ का अनुसरण करेगा. यह सच है की हम वर्तमान की किसी परिस्थिति को बदल ता नहीं सकते लेकिन वर्तमान में विचारों को चुन भविष्य में मनचाही परिस्थितियाँ जरुर पा सकते है.

एक महिला अपने दोनों बच्चों के साथ कार से कहीं जा रही थी की रास्ते में कार का टायर पंचर हो गया. महिला स्टेपनी बदलने लगी और बच्चे आस - पास खेलने लगे. सब कुछ हो गया था और वह जैक उतार ही रही थी की खेलते - खेलते एक बच्चा उसके पास आ गया. इधर तो उसका जैक उतारना हुआ और उधर उस बच्चे का टायर के नीचे पैर रखना. उस महिला को कुछ समझ नहीं आया बस उसने तो आव देखा न ताव कार के आगे गयी और कार को छः इंच ऊपर उठा लिया. ऐसा कार लेने के बाद तो वह स्वयं भी भौंचक्की राह गयी की वह ऐसा कैसे कर पायी.

यह होती है भावपूर्ण विचार की ताकत जिसे हमारे अंतस और मानस ने इस तरह स्वीकार कर लिया है की जिसके नहीं हो पाने की तनिक भी आशंका नहीं. हम अपने अंतस से जुड़ उस शक्ति से जुड़ जाते है जिससे यह स्रष्टि चलायमान है और फिर कुछ भी असंभव नहीं रह जाता.

आइए, हम अपने विचारों को दुरुस्त करें मंजिल अपने आप मिल जायेगी.


( दैनिक नवज्योति रविवार, 15 अप्रैल में प्रकाशित)
आपका
राहुल....

Saturday, 14 April 2012

खुद ही को बुलंद कर इतना





यह एक डाकू का ही दृढ - निश्चय ही था कि वो रामायण लिख पाया, वाल्मीकि ; और यह भी एक शिक्षक का दृढ - निश्चय ही था कि वह पूरे भारत - वर्ष को एक सूत्र में पिरो पाया, चाणक्य ; दृढ - निश्चय का एक और जीता - जागता उदाहरण मिसाइल मैंन और आज तक के सबसे चहेते राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जिन्होंने अखबार बेचकर अपनी पढाई को जारी रखा.

ये वे जीवन है जो हमें रास्ते कि मुश्किलों और अडचनों के समय अपने सपनो पर भरोसा करना सिखाते है और मंजिल कि याद दिलाते है. मंजिल से तुलना करते ही हमें इन बाधाओं कि लघुता और अस्थायी होने का अहसास हो जाता है. किसी भी व्यक्ति कि सबसे बड़ी ताकत उसके सपनो और लक्ष्यो का अहसास होती है और यही अहसास हमें सारी बाधाओं को पार कर अपने सपनो को पूरा करने कि हिम्मत देता है. यह अहसास हममें जीवन के हर क्षण बने रहना चाहिए.

निश्चय को अनुशासन बनाए रखता है. हम रोजमर्रा कि किसी आदत का ही उदाहरण लें जैसे सुबह कि सैर तो पायेंगे कि यदि एक बार क्रम टूट जाएँ तो उसे नियमित करना बहुत मुश्किल हो जाता है. इसका यही उपाय है कि जिस दिन सैर का मन न करें या कोई और कारण हो तो घर के बाहर ही जरा सी देर टहल लें. एक - दो दिन बाद अपने आप ही हमारी सैर पर जाने कि इच्छा होने लगेगी वरना हो सकता है सैर कि आदत यानी स्वस्थ रहने का निश्चय टूट जाएँ. किसी भी काम कि नियमितता ही जीवन को अनुशासित रखती है और इस तरह हमारे निश्चय और अधिक दृढ होते चले जाते है.

सबसे महत्वपूर्ण और नाजुक पहलू जहाँ हम सभी चुक कर बैठते है वह है दृढ निश्चय और हठ में फर्क करना. दृढ निश्चय अंतस कि आवाज़ के प्रति हमारी निष्ठा है तो हठ हमारे अहम् कि उपज. यदि जीवन में कभी ऐसा लगे कि हमारी योजनाएं प्रकृति की योजनाओं से भिन्न है. प्रकृति हमारे जीवन को किसी और रूप में लहलहाना चाहती है, किसी और सुगंध से महकाना चाहती है तो हमें बिना किसी ग्लानि के पूरे आत्म - विश्वास के साथ प्रकृति से ताल मिला लेनी चाहिए. यह समय होता है निश्चयों को पुनर्भाषित कर नयी राह चुनने का. सोचिये यदि गाँधी जी वकील और अब्राहम लिंकन व्यापारी ही बने रहते तो क्या होता ? सच तो यह है की हमारी पहली वचनबद्धता अपने आप से है फिर किसी और से, चाहे वह कोई विचार हो या व्यक्ति.

इसका मतलब यह कतई नहीं है की हम अपनी मनः स्थिति यानी मूड को प्रकृति के इशारे का नाम देकर रास्ते की बाधाओं से पीछा छुडा लें और अपने जीवन को भाग्य भरोसे कर दें. अनुकरणीय व्यक्तित्व वही है जो शुरूआती आनंद के बाद भी अपने काम में उसी जोश के साथ लगा रहे जो उसमें सपनो को देखते समय था. जीवन को भाग्य भरोसे करना मतलब अवसरों का इंतज़ार करना. जीवन को इस तरह जी कर भी हम कई बार सफल होंगे और कई बार असफल लेकिन हर बार अपने आपको और कमजोर बनाएँगे लेकिन यदि हमारे जीवन का मूलमंत्र दृढ निश्चय है तो ज्यादा बार सफल होंगे, कुछ बार असफल भी लेकिन हर बार और अधिक मजबूत होकर उभरेंगे. अवसर गुलामी है तो दृढ निश्चय पुरुषार्थ. वास्तव में हमारा जीवन ईश्वर का निश्चय है और हमारा निश्चय ईश्वर को हमारी भेंट. 


(दैनिक नवज्योति - 8 अप्रैल ; स्तम्भ - अपनी ज्योति आप)

आपका
राहुल.....  

Friday, 6 April 2012


सार-सार को गहि रहै,
थोथा    देई     उड़ाय.


हम अपनी दैनिक दिनचर्या से अभ्यस्त हो काम से ज्यादा काम करने के तरीको को तरजीह देने लग जाते है.निश्चित रूप से तरीको का अपना महत्व होता है लेकिन वे कभी उनके पीछे की मूल भावना से बड़े नहीं हो सकते. सुबह उठकर ईश्वर को धन्यवाद देने के लिए याद करना अच्छी आदत है और निश्चित रूप से इसका भी एक तरीका होना चाहिए लेकिन अहम् बात है ईश्वर को याद करना. होता यह है की हम आसन, मुद्रा और दिशा को इतना महत्त्व देने लगते है की ईश्वर को याद करना एक औपचारिकता बन कर रह जाती है.

कालांतर में तरीको की यह तरजीह ही रीती - रिवाजों को जन्म देती है जिन्हें हमारे संगठित धर्म हवा देते है. हम सभी लोग चाहे किसी धर्म - विशेष के क्यों न हो अपने - अपने पवित्र ग्रंथों में कही बातों के पीछे छिपी मूल - भावना की बजाय सुझाए तरीको को अपना जीवन - आधार बना लेते है ; जैसे उपवास के लिए सुझाए सात्विक और कम भोजन का उद्देश्य मन और शरीर को शांत रखना है जिससे अंदर देख पाना और ईश्वर को महसूस कर पाना आसान हो लेकिन हमारा सारा ध्यान क्या खा सकते है और क्या नहीं खा सकते है पर ही लगा रहता है. यहाँ तक की अनजाने भी कोई तामसिक चीज खाने में आ जाए तो हमारा उपवास टूट जाता है और ईश्वर रूठ जाता है.

ठीक उसी तरह हम अपनी जिन्दगी में जीने की बजाय जीने के तौर - तरीको को ज्यादा अहमियत देने लगते है. हर व्यक्ति अपनी जिन्दगी मे सुख, शान्ति  और सफलता पाना चाहता है लेकिन दूसरों की तरह ; यही है हमारी भ्रमित समझ. किसी ओर का जीवन हमारे लिए प्रेरणा हो सकता है पर हमें अपना रास्ता खुद तलाशना होगा. हिमालय पर जाने से भगवान नहीं मिलते भगवान मिलते है सच्ची भक्ति से . हाँ , हिमालय की शान्ति एकाग्र होने मे सहायक जरुर हो सकती है. यदि किसी को वही एकाग्रता लोकल ट्रेन के डिब्बे में मिलती है तो उसके लिए वही ठीक है. हमें अपनी सुख - शान्ति और सफलता के मायने खुद ढूंढने होंगे. हम अपनी तरह जी कर ही उन्हें पा सकते है किसी और की तरह जी कर नहीं. तौर - तरीकों की बजाय सार - तत्व को महत्व देना होगा. जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों और पहलूओं के लिए दूसरों के जीवन का उदाहरण नहीं बल्कि अपने अंतस की आवाज़ का सहारा लेना होगा.

अपने  आपको एवम अपने जीवन को सही अर्थों में समझने की शुरुआत हम अपने परिचय की भाषा को ठीक कर कर सकते है. में व्यापारी हूँ की बजाय यह कहें  की में व्यापार करता हूँ, मैंने इंजीनियरिंग की है न की मैं इंजिनियर हूँ. मेरा नाम राहुल है मैं राहुल ही नहीं हूँ. हमारी यह छोटी सी पहल हमारी समझ पर पड़े भ्रम के बादलों को हटाने मैं मदद करेगी.यहाँ मुझे कबीर याद आ रहे है. जुलाहे का काम करने से कोई कबीर नहीं बन जाता लेकिन कबीर हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता चाहे आप जुलाहे का ही काम क्यूँ न करते हो.
उन्ही के शब्दों में,
साधु  ऐसा चाहिए  जैसा  सूप  सुहाय,
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय.

(दैनिक नवज्योति - रविवार,1अप्रैल)
आपका, 
राहुल......