Saturday, 21 April 2018

मैं ही मेरा दोस्त





आज बात एक दुविधा की, लेकिन उससे पहले उसके बैकग्राउण्ड की। बैकग्राउण्ड ये कि जैसे शरीर की अपनी जरूरतें हैं वैसे ही मन की भी अपनी जरूरतें हैं। उसके बिना वो नहीं रह सकता। और ऐसे देखें तो स्वीकार किया जाना शायद व्यक्ति की पहली मानसिक जरुरत है। स्वीकार किया जाना, जैसे आप हैं वैसे के वैसे। जहाँ आपकी कमियाँ आपकी विशेषताएँ बन जाती है। इसलिए यही प्रेम की बुनियाद भी होती है। 
कहते हैं सबसे पवित्र प्रेम माँ और बच्चे के बीच होता है क्योंकि वे एक दूसरे के लिए पूर्ण होते हैं, जैसे है वैसे। एक माँ के लिए अपने बच्चे से सुन्दर दूसरा दुनिया में कोई नहीं होता और एक बच्चे के लिए माँ उसका अन्तिम पड़ाव होती है। 

अब दुविधा ये कि इस तरह हमारा स्वीकार किया जाना सामने से आता है। कोई और चाहिए होता है जो हमें स्वीकार करे। हमारी इस मानसिक जरुरत के लिए हम किसी और पर निर्भर होते हैं। हमें अपने घर में, अपने काम में, अपने दोस्तों में, समाज में, हर जगह ऐसे व्यक्तियों की जरुरत होती है जो हमारे होने को हामी भरें। या यों कह लें इन सारी जगहों पर स्वीकार किए जाने के लिए ही हमारी सारी जुगतें होती हैं। व्यक्ति अपनी मूलभूत जरूरतों के बाद जो कुछ करता है वो इसीलिए तो करता है! अब यहाँ मुश्किल है। ये किसी और पर निर्भरता! कोई और हमें ये अहसास दिलाए कि हम जैसे हैं ठीक हैं, यही गड़बड़ है। अब दुर्भाग्य से किसी के जीवन में ऐसे लोग न हों तो वो क्या करे? और यहाँ तक भी ठीक लेकिन यदि जीवन में ऐसे लोग हों जो हर बात में उसकी गलती निकालते हों, उसे सुधारना चाहते हों, चाहते हों कि वो अपने तरीकों से नहीं उनके तरीकों से जिए तब तो बेचारे का दम ही घुट जाएगा। मुफ्त में अपना जीवन कुण्ठा और अवसाद में गुजार रहा होगा। होगा तो वो अपने आप में बिल्कुल ठीक लेकिन महज इसलिए कि उसके जीवन में इस बात का अहसास दिलाने वाले लोग नहीं, वो ऐसे जीने को मजबूर होगा। 
ये तो कोई बात नहीं हुई! हमारा जीवन, हमारा मन, हमारी खुशियाँ क्यूँ किसी और पर निर्भर रहे! क्या हो कि हम अपने आप को ठीक, बिल्कुल ठीक माने चाहे कोई कुछ कहे। 
और कुछ ऐसा होगा भी क्योंकि प्रकृति की योजना में जब सब कुछ परफेक्ट है तो वो हमें यूँ दूसरों पर निर्भर बनाने से रही! पर वो क्या है?

सारे जवाब सवालों में ही छुपे होते हैं, शायद मेरा भी वहीं था। 
और वो छुपा था 'प्रकृति' शब्द की ओट में। 
हमें अपने दैनिक जीवन का कुछ हिस्सा प्रकृति को देना होगा। प्रकृति को देना यानि अपने आप को देना क्योंकि हम भी तो प्रकृति ही हैं। कुछ वक्त उन चीजों के साथ गुजरना होगा जिनमें कोई अहं नहीं। कुछ ऐसे काम करने होंगे जो फायदे-नुकसान से परे हैं। कभी अपरिचित लोगों के बीच जाना होना या अनदेखी जगहों के लिए निकलना होगा।
आप जब इनमें से अपने माफिक का कुछ भी कर रहे होंगे तब प्रकृति उसी लहजे में आपको ये अहसास दिला रही होगी कि मैं जैसी हूँ वैसी ठीक हूँ इसलिए तू भी जैसा है ठीक है। और तब आपको किसी और की जरुरत नहीं होगी। आप हर हाल में ठीक होंगे, बिल्कुल ठीक। 

तो जो मैं समझा वो ये कि सारी मुश्किल अपने साथ नहीं होने की है, अपने साथ कुछ देर नहीं बैठने की है। यदि हम अपने से दोस्ती कर लें तो फिर और दोस्त मिलें तो भी ठीक और नहीं मिलें तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता।

दैनिक नवज्योति स्तम्भ-'जो मैं समझा' 
(रविवार, 11 मार्च 2018 के लिए)

Thursday, 1 March 2018

एक मोहब्बत भरा दिल







एक ताजमहल और बनने को है, और इस बार इसे बनाने वाले हैं 81 वर्षीय रिटायर्ड पोस्टमास्टर साहब श्री फैजुल हसन कादरी। चौंक गए ना आप, पर ऐसा ही है। संयोग तो नहीं होगा कि उनकी महरूम बेगम का नाम भी ताजमुली ही था। खुदा को शायद मालूम रहा होगा कि ये मोहब्बत किसी दिन यूँ परवान चढ़ेगी इसीलिए उनका नाम कुरान के पन्ने पर उस दिन ताजमुली खुला होगा ! 
बेशक ये बन रहा ताजमहल बहुत छोटा है लेकिन इसकी वजह खालिस मोहब्बत है किसी शहंशाह की नुमाईश नहीं। आप ही सोचिए, एक बुजुर्ग का दिल कितना मजबूर रहा होगा जो छोटा ही सही अपनी बीवी की याद में ताजमहल बनाने निकल पड़ा। 
इस दरियादिल इन्सान से बुलन्दशहर का शायद ही कोई बन्दा होगा जो वाकिफ नहीं होगा!

ढाँचा बनने को आया था, एक दिन सुबह की बात है, क्या देखते हैं! स्कूल के हेडमास्टर साहब कुछ परिचितों के साथ दरवाजे पर खड़े हैं। समझ नहीं आया, क्या बात होगी। उन्हें पूरे आदर से अन्दर लाए, बिठाया और पूछने लगे। पर वे सब हिचकिचा रहे थे, 'आप ही कहिए, आप ही कहिए।' आखिर उनमें से एक जो कादरी साहब से थोड़ा ज्यादा सहज था कहने लगा, वो बात यूँ है कादरी साहब कि हम लोग एक लड़कियों की सरकारी स्कूल बनाने में जुटे हैं। बस अब पूरी होने को है कि पैसों की किल्लत आन पड़ी है। बड़ी मुश्किल से इलाके में एक लड़कियों की स्कूल की रजा मिली थी, कहीं ऐसा न हो सारी मेहनत फालतू हो जाए। कई 'बड़े लोगों' को टटोल आए, अब आखिर हार कर आपका दरवाजा खटखटाया है। 

कादरी साहब एक मिनट के लिए तो उलझन में पड़ गए, लेकिन मोहब्बत वाले दिमाग से नहीं दिल से फैसले लेते हैं इसलिए उन्हें ज्यादा वक्त भी नहीं लगता। उन्होंने कहा, मुझसे हो सकेगा जितनी मदद जरूर करूँगा।
और उन्होंने स्कूल के लिए अपनी जमीन का आखिरी टुकड़ा तक बेच दिया। लेकिन 'ताजमहल' रुक चुका था। कोई छह-सात लाख ही तो और चाहिए थे! स्कूल पूरा हुआ तो कादरी साहब फिर जुट गए। सहारा तो अब पेंशन का ही था इसलिए एक-एक पाई जोड़ने लगे। कुछ वक्त बीता और काम एक बार फिर शुरू हुआ। 
अभी चाल ही ठीक से नहीं बनी थी कि उनकी भतीजी की जिन्दगी में ऐसा कुछ हुआ कि कादरी साहब फिर से अपने आप को नहीं रोक पाए। करीब लाख रुपये इकट्ठा हुए थे, वे उन्होंने उसे दे दिए। 

सच्ची प्रेरक कहानियों की तलाश में अक्सर मेरी मुठभेड़ ऐसी ही अद्भुत ख़बरों से हो जाती है। इंशाअल्लाह, ये ताजमहल तो बन कर रहेगा लेकिन इस कहानी ने जो समझने का मौका दिया वो ये कि आखिर एक मोहब्बत भरा दिल होता क्या है?
और जो मैं समझा वो ये कि जो जीवन की हर खूबसूरती पर आ जाए, जो अपने किसी को तकलीफ में न देख पाए, जो दुनिया को और खूबसूरत बनाने की तड़प रखे, जो किसी मुश्किल के सामने लाचार न हो; वही सचमुच एक मोहब्बत भरा दिल है। 
वैलेंटाइन-डे और बसन्त से सही ऐसी किसी कहानी का मौसम क्या होगा लेकिन इन्हें कहना और भी जरुरी हो जाता है जब हम प्यार और मोहब्बत के नाम पर एक-दूसरे से लड़ने में यों लगे हों; फिर चाहे वो हमारा प्यार अपने धर्म, अपने समुदाय से हो या अपनी विचारधारा से हो। 

दैनिक नवज्योति स्तम्भ-'जो मैं समझा' 
(रविवार, 11 फरवरी 2018 के लिए)

Saturday, 3 February 2018

मैं खुश रहूँगा






'अरे! आप', उसने कहा था। हम दोनों अक्सर किताबों पर होने वाली हमारी मासिक गोष्ठी में मिला करते थे। कुछ देर इधर-उधर की बातें हुईं और फिर किताबों पर आकर ही ठहर गई। हम कोई साज बजा लें आखिर राग अपना ही अलापने लगते हैं। लेकिन इस बातचीत का एक तीसरा पक्ष भी था। उसके साथ एक वृद्ध आए थे, पद्माकर जी। मैं नहीं मिला था पहले उनसे कभी लेकिन जाने कितने वर्षों बाद इतना भावपूर्ण सन्तुष्ट चेहरा देखा था। हमारे चेहरे तो ऐसे नजर आते हैं जैसे सर पर सौ-दो सौ किलो का सामान रखा हो और बेचारी चेहरे की मांसपेशियाँ बस उसे ही सहन करने में लगी हों। उनकी बातें इतनी आनन्द से भरी थीं कि कुछ ही समय में लगने लगा था कि हम एक-दूसरे को न जाने कब से जानते हैं। 

उन्होंने जो बताया वो ये था कि वो वहीं पीछे ही अपने बेटे के यहाँ आए हुए हैं। करीब तीन महीने रहेंगे। उम्र 84 वर्ष है, सुबह घूमने जाते हैं लेकिन बूढ़ों के साथ नहीं घूमते। जवाब देते हैं, "मैं बूढ़ा हो जाऊँगा तब तुम्हारे साथ घूमूँगा", रेल्वे की नौकरी से रिटायर हुए हैं और पति-पत्नी अजमेर रहते हैं। 
उनके जाने के बाद सोचने लगा, कितनी परफेक्ट लाइफ है अंकल की। इस उम्र में पति-पति का साथ बना हुआ है, बिना किसी सहारे के अपनी जगह पर रह पा रहे हैं, स्वस्थ हैं, पेंशन मिल रही होगी, शायद यही इनके इतने खुश, इतने सन्तुष्ट होने की वजह है। 
पर जो हो मैं उनसे प्रभावित था। 

कुछ दिनों बाद फिर वे एक दिन आये। वे वैसे ही आये थे लेकिन मेरी जिज्ञासा उनके इतने खुश, इतने सन्तुष्ट रहने के राज जानने की थी। किताबों की बातों को मैंने उनके जीवन तक पहुँचाया और उनसे पूछने लगा। 
लेकिन जो कुछ मालूम चला वो तो कुछ और ही था! 
आंटी को पार्किन्सन था, इस हद का कि डॉक्टर्स ने दस साल पहले ही कह दिया था कि बेहतर है आप ईलाज न लें। मरीज की उम्र बढ़ाना उसे तकलीफ देना होगा। एक ऐसा व्यक्ति जो अपने हरे-भरे दिनों में अपनी दिनचर्या के लिए पूरी तरह अपनी पत्नी पर निर्भर था, पिछले दस सालों से अपनी पत्नी का यों ध्यान रख रहा था, यों सेवा कर रहा था कि उनकी बीमारी आज भी नियन्त्रण में थी। इन सब के बावजूद वो अपनी जगह, अपने घर अजमेर में ही रहना चाहता था क्योंकि सुविधा से ज्यादा उसे स्वतन्त्रता प्यारी थी। वे कह रहे थे कि मैं घूम कर लौटूँ तब मेरे नाश्ते का समय हो न कि मुझे नाश्ते के समय लौटना पड़े। दुख है उन्हें तो बस एक बात का कि मैं चला गया तो इसका ध्यान कौन रखेगा? लेकिन वे जिन्दादिल हैं। हर बात में हँसी ढूँढ़ते हैं। आप को उनके साथ बैठकर लगता है कि मैं कितने दिनों बाद अपनी स्वाभाविक हँसी हँसा हूँ। 

उनसे मिलना एक अनुभव है और उनसे मिलकर जो मैं समझा, एक बार फिर से, वो ये था कि स्थितियाँ कभी परफेक्ट नहीं होती। वे सबके लिए, सबके साथ जिन्दगी भर खट्टी-मिट्ठी बनी रहती हैं। हमारा खुश होना हमारी जिन्दगी की परिस्थितियों पर कभी निर्भर करता ही नहीं है कि जिसकी अनुकूल है वो खुश है और जिसकी नहीं वो नाखुश। खुश होना हमारा निर्णय होता है, जिन्दगी के जैसे दौर से भी हम गुजर रहें हो उसके बीच। 
और जिन परिस्थितियों को हम नहीं बदल सकते वे खुश रहने से भी बदलती तो नहीं लेकिन तब उनके साथ जीना बहुत, बहुत आसान हो जाता है। फिर कौन है जिसको सब मिला है, जिसको कोई दुख नहीं लेकिन फिर भी कुछ लोग खुश, सन्तुष्ट नजर आते हैं और कुछ परेशान, थके-थके क्योंकि कुछ ने खुश रहना चुना होता है और कुछ ने नाराज रहना। तो बात सोचने कि है कि हम हमारे लिए खुशी के अलावा कुछ और चुन ही कैसे सकते हैं! 
​राहुल हेमराज_

दैनिक नवज्योति; कॉलम- 'जो मैं समझा' 
(रविवार, 14 जनवरी 2017 के लिए)

Saturday, 27 January 2018

आस्था का विज्ञान





कई वर्षों बाद अपने एक पुराने मित्र से मिलना हुआ। वे अपनी माता जी से अगाध प्रेम करते हैं, ये बात मैं शुरू से जानता था। उनकी माता जी को अपने अन्तिम वर्षों में लकवा मार गया था। उन वर्षों में मेरे मित्र ने उनकी उतने ही लगन से सेवा की जितने जतन से उन्होंने कभी उन्हें पाला-पोषा होगा। पर इस बार जो मालूम चला वो प्रेम नहीं भक्ति है। जब लगने लगा था कि अब उनकी माता जी कभी भी जा सकती है उन्होंने मलमल के सफेद कपड़े पर केसर के पानी से उनके पगलिए ले लिए थे, और वो भी कई-कई सारे। यानि केसर के पानी से उनके पगों के निशान। वे हर खास जगह उन्हें रखते हैं, अपने घर में-अपने ऑफिस में और कोई नई शुरुआत हो तब भी सबसे पहले स्थापना उन्हीं की होती है। उनका मानना है कि कहीं भी उन पगलियों का होना साक्षात् उनकी माताजी का होना है, और जब तक वे हैं, उनका कुछ नहीं हो सकता। उनका काम बन के ही रहेगा। मुश्किलें आएँगी तो मदद वे भेजेंगी। कैसे? ये उनकी चिन्ता का विषय नहीं है। उन्हें तो बस, आगे बढ़ते जाना है। 

पहली बार जब वे मुझसे ऐसा सब कह रहे थे तब मुझे भी ये निरा अन्धविश्वास ही लगा था। पर जितने जोर से वे कह रहे थे, और उनके जीवन में जब-तब हुए उन पगलियों से हुए चमत्कारों की कहानियाँ सुना रहे थे मेरे दिमाग से ये बात उनके जाने के बाद भी न जाने कब तक बनी ही रही। बात दिमाग के पास थी तो भला कैसे बचती! और धीरे-धीरे मुझे इसके पीछे का विज्ञान दीखने लगा। 

वो आस्था उनके सोच को स्पष्टता और इरादों को दृढ़ता दे रही थी। उन्हें अपने मन में कोई सन्देह था ही नहीं। उनका पूरा ध्यान किसी भी काम में बस इस बात पर ही रहता था कि उसके लिए उन्हें करना क्या-क्या है। कौन से तरीके सबसे सुगम होंगे। वे हमेशा स्पष्ट रहे कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं। क्योंकि काम तो हो जाएगा, उसे करने या न करने का निर्णय सिर्फ इस बात पर टिका होता था कि क्या सचमुच ये काम मैं करना भी चाहता हूँ! ऐसे काम वे ही होते हैं जिनकी आवाज अन्दर से आती है और अन्दर से आवाज उन्हीं के लिए आती है जो आपके लिए बने हों। और ये बात हम जो भी करते हैं उस पर भी जस की तस लागू होती है। 

जब किसी का भी मानसिक वातावरण ऐसा हो तो उसकी सफलता असन्दिग्ध हो जाती है, जिसे वे श्रद्धा से अपनी माँ का स्नेह और आशीर्वाद कहते हैं। तब लगने लगा ये सारी बातें बेमतलब नहीं होती, इन सब के पीछे अपना विज्ञान होता है। ये हमारे विश्वासों को अखण्ड बनाए रखने के सुन्दर बहाने होते हैं। पर हाँ, जब हम कर्म से विमुख हो इनके भरोसे हाथ पर हाथ धरे बैठ जाते हैं, इन्हीं की पूजा को सफलता का पर्याय समझने लगते हैं तब इन आस्थाओं को अन्धविश्वासों में बदलते देर नहीं लगती। 

तो जो मैं समझा वो ये कि आस्था सफलता का मन्त्र है, अंधविश्वासों का दूसरा नाम नहीं यदि हम उससे स्पष्ट हुई सोच और दृढ़ हुए इरादों को अपनी ऊर्जा बना लें। जब हम बिना सन्देह के कुछ भी करने या न करने का निर्णय इस बात पर लेने लगें कि क्या मेरा वैसा करना मेरे लिए उचित होगा? क्या वो मुझे ख़ुशी देगा? 
बस यहाँ तक ही नहीं, ये भी कि किसी न किसी बात में तो हमारी आस्था होनी ही चाहिए। जरुरी नहीं वो किसी श्रद्धा में ही हो, वो किसी के साथ में, किसी की सलाह में या ऐसी ही किसी और बात में हो सकती है पर होनी जरूर चाहिए। बिना आस्था के आप कितनी ही सफलता पा लें, वो लेशमात्र ही सही कम तो होगी जितनी हो सकती थी। 

(दैनिक नवज्योति; रविवार, 10 दिसम्बर 2017 के लिए)

Monday, 25 December 2017

बच्चों की सीख

और उसने कहा, "यदि मैं थोड़ा बहुत भी असंतुष्ट नहीं होऊँगा तो कुछ भी पाने की कोशिश ही नहीं करूँगा? मैं अपने जीवन में प्रगति करता चला जाऊँ इसके लिए जरुरी है कि मेरे मन में थोड़ी-बहुत ही सही, असंतुष्टि बनी रहे।"
ये पहला मौका नहीं था जब मुझे ऐसा कुछ सुनने को मिला था; कैरियर, प्रोग्रेस या सक्सेस के नाम पर जिन्दगी के बारे में जब-जब किसी से बात हुई ऐसा ही कुछ सुनने को मिला था। 
संतुष्टि जैसे ठहराव का पर्याय है!
पर क्या ऐसा है?

ऐसा होता तो सबसे पहले आपको बच्चे असंतुष्ट, बेचैन नजर आते क्योंकि कोई भी व्यक्ति बचपन में जितना कुछ नया सीखता है, जितनी प्रगति कर पाता है वैसी शायद ही जिन्दगी के और किसी दौर में कर पाता हो। बोलना, चलना, दौड़ना, लिखना और न जाने क्या-क्या? कितनी जल्दी वो भाषा सीख जाता है, बिना किसी व्याकरण के, बिना किसी टीचर के। क्या आप और मैं बड़े होने के बाद उतनी ही सहजता से किसी भाषा को सीख सकते हैं?, सवाल ही नहीं!
पर वो तो दुनिया का सबसे संतुष्ट प्राणी नजर आता है। 
बस, इसी बात में हमारा उत्तर और उत्तर का कारण छिपा है।
संतुष्टि ठहराव का नहीं प्रगति के लिए पूरी तरह से तैयार होने का पर्याय लगता है। आप जो हैं, आपके पास जो है उसके प्रति कृतज्ञ होते हैं और उसके होने से खुश हैं। ये कृतज्ञता, आपका खुश मन आपको वो सब पाने के लिए उत्साह और उमंग से भरे रखता है जो आप पाना चाहते हैं। 

चाहना, हमारा और हमारी ही तरह प्रकृति के हर अंग का नैसर्गिक गुण है। हम सब कल जो थे उससे आज आगे बढ़ रहे हैं, बीज पौधा बन रहा है, पौधों पर फूल आ रहे हैं, .........। 
यानि आगे बढ़ना, प्रगति करना हमारे अन्दर है। 
लेकिन असंतुष्टि, वो बाहर से आती है। किसी को देखकर, किसी से अपनी तुलना करके या अपने आपको किसी और के तय किए मापदण्डों पर कस के। ये आपकी नहीं होती, इसलिए आपकी कोई मदद भी नहीं करती। आप जिन्हें देखकर अपनी असन्तुष्टियाँ तय करते हैं वे जब तक पूरी होती हैं तब तक उनकी जगह कोई और आ चुका होता है और आप नई असन्तुष्टियाँ पाल चुके होते हैं, बिल्कुल एक मृग-मरीचिका की तरह ये मिलती कभी नहीं पर बनी हमेशा रहती है। 

इस तरह असंतुष्ट रहना हमारी आदत में शुमार हो जाता है। हम कुछ भी पाकर असंतुष्ट ही बने रहते हैं क्योंकि हम ही ने तो तय किया होता है कि चूँकि हमें जिन्दगी में प्रगति करनी है तो मन में थोड़ा-बहुत ही सही असंतुष्टि का भाव तो रखना ही होगा। हम जीवन भर असंतुष्ट बने रहते हैं इसीलिए जीवन भर नाखुश भी क्योंकि जिस घर में असंतुष्टि रहती हो वहाँ ख़ुशी तो फटक भी नहीं सकती। यानि एक मिनट के लिए मान भी लें कि मन की असंतुष्टि से हम कुछ पा भी लेंगे तो यकीन मानिए वो हासिल आपको खुशियाँ तो नहीं ही दे पाएगा। और जब आपकी प्रगति आपके जीवन में खुशियाँ ही नहीं ला सकती तो पहला, वो किस काम की होगी? और दूसरा, कि क्या वो सचमुच प्रगति भी होगी? 


तो जो मैं समझा वो ये कि 
हम जो हैं, जैसे हैं, जो कुछ हमें मिला है उसके लिए प्रकृति के प्रति कृतज्ञ बने रहने का अभ्यास करना होगा। ये कृतज्ञता मन में संतुष्टि का भाव लाएगी और तब हम उत्साह और उमंग के साथ अपने जीवन में जो कुछ करना चाहते हैं, जो कुछ पाना चाहते हैं, के लिए तत्पर होंगे। 
चाहना और असंतुष्ट होना दो अलग-अलग बातें हैं। एक हमारा नैसर्गिक गुण है तो दूसरा एक नकारात्मक भाव जो अन्ततः जीवन में नकारात्मकता ही ला पाएगा। 
और जब हम उत्साह और उमंग के साथ जीवन में बढ़ रहे होंगे तब प्रगति सहज और खुशियाँ स्वाभाविक होगी और यही सही मानों में हमारी प्रगति होगी।    

Saturday, 7 October 2017

कैसे थमे ये सिलसिला?


फिर एक बाबा के कारनामे सामने आए हैं। पहले वो, फिर उनके और अब ये, सिलसिला थमता ही नहीं। कितने लोग ठगे जाते हैं, कितनी जिन्दगियाँ बरबाद होती हैं? लाखों लोग अपने जीवन का आधार उनके प्रति अपनी श्रद्धा को बना लेते हैं। ये श्रद्धाएँ जब टूटती हैं तो इन लोगों के साथ वही होता है जो उस वृक्ष के साथ होता है जिसके नीचे की जमीन अचानक आयी तेज बारिश में बह गई हो। और ऐसे में जिस तरह वृक्ष के गिरने का खामियाजा आस-पास के पेड़-पौधों को भुगतना पड़ता है वैसे ही बिखरी आस्थाओं के इन लोगों के क्रोध का शिकार रास्ते में पड़ते आम आदमी को होना पड़ता है।  

आज उनका आधार खोया है, कल हो सकता है मेरा भी खोए और परसों आपका। हम सब ये जानते हैं, फिर भी हर बार ठगे जाते हैं। क्यों करते हैं हम ऐसा जानते-बुझते? कहाँ चूक हो जाती है हमसे? 
अपने ही मन को खँगालने लगा तो पाया, हम सब को अपने-अपने जीवन में किसी न किसी आदर्श पुरुष की तलाश होती है। एक ऐसा व्यक्ति जिसकी तरफ हम हर छोटी-बड़ी बात के लिए देख सकें, उसका जीवन-उसकी बातों को आँख मूँद कर मान सकें, जो हमारी सुने, हमें दिलासा दें और फिर हौसला बढ़ाए। हमें प्रेरित करे। एक समय था जब अमूमन हमारी ये सारी जरूरतें देश-समाज के नायकों को देख, अपने घर के बड़ों से और मित्रों से ही पूरी हो जाया करती थी। सामाजिक-राजनैतिक जीवन के अग्रज वे होते थे जिनका जीवन अनुसरणीय होता था, घर के बड़े हमें हौसला और प्रेरणा देने के लिए काफी होते थे और दोस्त ऐसे के जिनके सामने हम अपने दिल के गुबार आसानी से खोल पाते थे। 
फिर, ......फिर समय के साथ ये ताना-बाना पहले ढीला और फिर टूटता चला गया। 
और हम अकेले हो गए। 

इस अकेलेपन का फायदा उठाया इन बाबाओं, पंचों और नेताओं ने। 
कारण ही समाधान होता है। पहले तो हमें अपने आप को मजबूत करना होगा। अपने अकेलेपन को स्वीकार करना होगा क्योंकि जो ताना-बाना समय के इतने बड़े अन्तराल में बिखरा है वो एक दिन में तो ठीक होने से रहा! हमारी ये स्वीकार्यता स्वतः हमें इस भाव से भर देगी कि जिस तरह मैं अकेला हूँ वैसे ही मेरे अपने भी अकेले हैं। और तब अपने आप हमारे हाथ बढ़ने लगेंगे, दूरियाँ कम होने लगेंगी। ताना-बाना फिर से कसने लगेगा। जब ऐसा होने लगेगा तब हम किसी को भी अपनी श्रद्धा यूँ ही नहीं अर्पित कर रहे होंगे। हमारे विश्वास घर देख कर ही किसी को अपनाएँगे। 
जब ऐसा होगा तब देश और समाज की रखवाली भी उनके हाथ होगी जो इस लायक होंगे। जिनके जीवन ही प्रेरणास्पद होंगे। और तब ये सिलसिला थमेगा वरना हर बार हम अलग-अलग नामों से यूँ ही ठगे जाते रहेंगे। 


तो जो मैं समझा वो ये कि 
भावनाओं से बढ़कर कुछ नहीं, हमें भावनाओं की तरफ लौटना होगा, एक दूसरे के सुख-दुख भागीदार होना होगा। श्रद्धा समर्पण से जन्म लेती है यानि सबसे पवित्र और कोमल भावना। इसे हम किसी को यूँ ही नहीं सौंप सकते। ये किसी के प्रति स्वतः जन्म लेती है तो ठीक, इसे अपने किसी काम साधने के लिए किसी को नहीं सौंप सकते। और ऐसा तब होगा जब मूल्य हमारे जीवन को निर्देशित कर रहे होंगे। ऐसे में हमारी अगुवाई अपने आप ही वैसे लोग कर रहे होंगे जो इस लायक होंगे क्योंकि आखिर वे भी तो हम में से ही निकलते हैं।  

(दैनिक नवज्योति में रविवार, 10  सितम्बर को प्रकाशित)

Saturday, 23 September 2017

आत्मा बची रही


"यदि ऐसा ही होना है तो होने दो।", यही कहा था शालिनी ने उस मनोचिकित्सक को जो न जाने क्या-क्या सोच कर कैसी-कैसी तैयारी करके आया था। उसे शालिनी को खबर देनी थी कि हो सकता है उसे अपने दोनों हाथ और दोनों पैर गवाँ देने पड़े। 
ऐसा क्या हुआ था?, कुछ खास नहीं। ये बात है, 2012 की। वो उम्मीदों से थी और शादी की चौथी सालगिरह मनाने अपने पति के साथ कम्बोडिया गई थी। छुट्टियाँ बड़ी मजेदार रहीं, वापस लौटी तो हल्का बुखार रहने लगा था। डॉक्टर्स ने कहा, डेंगू होगा!  और वो अस्पताल में भर्ती हो गई। वाजिब से ज्यादा दिन बीतने आए थे पर पारा टस से मस नहीं हो रहा था। इस बीच एक दिन इस बुखार ने उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की भी जान ले ली। इतने दिन, अब डॉक्टर्स को भी समझ में आ रहा था कि बात डेंगू तक की ही नहीं है, और उन्होंने रक्त की विस्तृत जाँचे करना शुरू की। 
जो मालूम चला वो हैरतअंगेज था, कम्बोडिया में किसी विशेष मच्छर के काटने से वो ऐसे इन्फेक्शन के चपेट में आ चुकी है जो शायद 10 लाख लोगों में से किसी एक को होता होगा। इस बात को पता चलने में वक्त अब इतना बीत गया कि शरीर के करीब-करीब सारे अंग इसकी गिरफ्त में थे, वो कोमा में जाने जैसी हालत में थी; तब की बात है जब मनोचिकित्सक ने आकर उसे वो सब कहा था, पर ये भी कि "हम कोशिश पूरी करेंगे।"

सबसे पहले बायें हाथ का ऑपरेशन हुआ। उसके कुछ ही दिनों उसके देवर अस्पताल में उसकी मदद कर रहे थे कि दायाँ हाथ छिटक कर उनके हाथ ही में आ गया। इस तरह कुछ महीने और बीते, बाकि अंगों पर इन्फेक्शन का प्रभाव तो काबू में आने लगा था लेकिन बचते-बचाते भी उसके दोनों पैर गैगरिन की चपेट में आ गए। इसके बाद तो वो कोई अंग हो उसे अलग करने के अलावा कोई चारा ही नहीं बचता। शालिनी बताती है, ऑपरेशन के पहले उसने खूब चमकीली बैंगनी नेल पॉलिश से पैरों को सँवारा था,"इन्हें जाना ही है तो जरा स्टाइल में तो जाएँ।"

इस तरह अस्पताल के बेड से उठ कृत्रिम, प्रोस्थेटिक पैरों के सहारे बाहर निकलने में उसे करीब दो साल लग गए। इसके बावजूद वो अपनी दैनिक दिनचर्या के अधिकाँश कामों के लिए अपने पति पर तो निर्भर थी ही, पर इससे उसे कोई तकलीफ नहीं थी। तकलीफ थी उसे अपने मन की। वो किसी भी हालत में तैयार नहीं थी कि किसी दिन उसमें जीने का उत्साह ही शेष नहीं रहे। उसका होना, न होना एक-सा हो जाए। वो अपने होने को साबित करना चाहती थी। एक दिन उसने सोचा क्यों न वो एथलीट होने का रास्ता चुने। दौड़े, और यही तो एक काम था जो वो अब कर सकती थी। 
और वो पहुँच गयी ग्राउण्ड पर। जब आप चलने लगते हैं तो रास्ते अपने आप बनने लगते हैं। कोच अय्यपा सर उतनी ही शिद्दत से तैयारी करवाने लगे, उन्होंने कभी उसे विकलांग होने को कभी छूट नहीं दी। पति प्रशान्त का तो हर कदम पर साथ थे ही। 

और अब आप अपने दाँतो तले ऊँगली डाल लीजिए, शालिनी ने हाल ही में 10 कि.मी. की टीसीएस बैंगलुरु मैराथॉन कम्पलीट की है, और अब वो पैरा ओलंपिक्स की तैयारी में जुटी है। "जब मेरा दायाँ हाथ छिटका था तब वो मेरे आगे बढ़ने का संकेत था" और ये सब लिखा उन्होंने अपने ब्लॉग 'आत्मा बची रही।' 
ये कहानी सामने आयी तो मैं इसे आपके साथ साझा करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा था और इससे जो मैं समझा वो ये कि हर स्थिति में हमें ही अपने आपको उठाना होता है। यदि निकलने की कोशिश हमने नहीं की तो बाहर खड़ा व्यक्ति कितना ही हाथ दे दे, कुछ नहीं होने वाला। और ये भी कि हर स्थिति में हमारे पास कुछ तो बचा होता है जैसे शालिनी के पास दौड़ना बचा था। यही वो बात है जिस पर हमें अपने विश्वास को दृढ करना होगा, यही तो वो सहारा है जिसे ले हम अपने आप को उठा पाएँगे, सम्भाल पाएँगे। 

राहुल हेमराज_
(दैनिक नवज्योति, रविवार 13 अगस्त 2017