Saturday, 30 June 2018

काम का दबाव, कितना सही?






फेसबुक पर मित्र ने एक वीडियो शेयर किया था। एक युवा मोटिवेशनल गुरु बड़े ही आकर्षक तरीके से बता रहे थे कि 'प्रेशर' यानि काम का दबाव कोई नकारात्मक शब्द नहीं है जैसी की आम धारणा है। ये तो इस बात का प्रूफ है कि हमारे पास इतना काम है कि हम उसे कैसे करें और पहले क्या करें! ये दबाव ही है जो हमें सामंजस्य और अपने काम की मुश्किलों के प्रति विनम्र होना सिखाता है। वे आगे एक बड़ा ही रोचक उदाहरण देने लगते हैं; कहते हैं, जैसे हम एक कच्चा आलू खा नहीं सकते लेकिन जैसे ही प्रेशर-कुकर की तीन-चार सीटियाँ वो सुन ले, वो खाने लायक बन जाता है वैसे ही काम का प्रेशर-कुकर हमें लचीला बना हर तरह के व्यक्ति के साथ व्यवहार करने में कुशल बना देता है और तब हमारी सफलता निश्चित होती है। 
उनकी बातों की रौ में मैं ऐसा बहा कि मुझे भी लगा, क्या बात है! पर अगले ही क्षण लगा मन राजी नहीं है। कहीं कुछ खटक रहा था और मैं सोचने लगा.......... काम का दबाव होने का तो मतलब हुआ मन में इस बात की चिन्ता रहना कि ये सब मैं कर पाऊँगा भी या नहीं, तय नहीं कर पाना कि पहले कौन सा करूँ और कुछ भी करते समय उसके बाद क्या करना है उस पर ध्यान का बने रहना। 
तो भला, जो बात मन में चिंता, अनिश्चितता और उदिग्नता पैदा कर रही है वो कैसे सकारात्मक हो सकती है? 

सवाल भी सच में बारिश होते हैं, शुरू होते हैं तो झड़ी लगा देते हैं। क्यों कहा होगा उन्होंने ऐसा? ऐसा तो नहीं कि उन्हें इस बात का अहसास नहीं होगा! और सबसे बड़ा, फिर हमारा काम कैसा हो जो रात-दिन बढ़ता जाएँ, हमें और से और सफल बनाता जाए लेकिन उसका हम पर दबाव न हो?

सबसे पहले तो मैं उनकी जगह होकर सोचने लगा, एक मोटिवेशनल गुरु जिसने अपना कैरियर यही होना तय किया है और जो सोशियल मीडिया पर इसका प्रचार करने में जुटा हो! और तब दीखने लगा कि आजकल सारे ही लोग लोकप्रिय होने के लिए ऐसी ही बातें करने में लगे हैं। हमारी कमजोरियों, गलतियों को सही ठहराने में लगे हैं जिससे वे हमें पहली बार में ही अच्छे लगने लगें और स्वीकार हो जाएँ। हमारा अहं कहीं बीच में न आए और उनकी सक्सेस रेट बढ़ जाए। 
अब बात थी काम की जो सफलता की सीढ़ियाँ तो चढ़ाता जाए लेकिन दबाव की थकान जरा भी न हो। और मुझे डॉ. अभय बंग की वे पंक्तियाँ याद आने लगी। वे लिखते हैं, "नियन्त्रण जिनके स्वयं  हाथ में था, कैसा व कितना काम करें इसकी स्वतन्त्रता थी, उन्हें तनाव कम था।" काम पर नियन्त्रण यानि आप किसी पर निर्भर न हों। काम का कोई हिस्सा चाहे आप किसी और से करवा रहें हों लेकिन वो आपको भी करना आता हो। आपके काम का पूरा होना किसी और की मर्जी का गुलाम न हो। और काम की स्वतन्त्रता यानि आप इस स्थिति में हों कि तय कर सकें कि मैं कौन सा काम करूँगा और कितना करूँगा। काम आपको दौड़ाए नहीं आप उसकी सवारी करें। 
जब ऐसा होगा तो निश्चित ही है कि न दबाव होगा और न उससे उपजा तनाव।  

तो जो मैं समझा वो ये था कि दबाव का लगातार बने रहना इस बात का सूचक है कि आप का काम बदलाव की माँग कर रहा है। आपको कुछ और या इसी काम को किसी और तरीके से करना माफिक आएगा। बजाय इस बीमारी को 'सकारात्मक' कह टालते रहने से बेहतर होगा कि रुककर सोचें कि मैं अपने काम में क्या और कैसे बदलाव कर सकता हूँ कि मेरा काम मुझे दबाए नहीं मेरी खुशियों का, मेरी अभिव्यक्ति का साधन बन जाए! 

दैनिक नवज्योति स्तम्भ-'जो मैं समझा' 
(रविवार, 10 जून 2018 के लिए) 

Tuesday, 26 June 2018

एक रास्ता यह भी







दोस्तों के बीच उस दिन चर्चा का विषय था कि हमें किसी की राय से कोई फर्क पड़ना भी चाहिए या नहीं? हमें किसी की सुननी भी चाहिए या जो हमने सोचा है उसी पर चलते चला जाना चाहिए? शीर्षक दिया था हमने, "ओपिनियन मैटर्स?" एक ने कहा कि किसी की क्या राय है इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता, और पड़ना भी नहीं चाहिए क्योंकि इस शब्द में बू ही नकारात्मकता की है। लेकिन हाँ, यदि कोई अपना मुझे सलाह देता है तो मैं जरूर सुनूँगा। सलाह आपको सुनती है और राय आपको एक खास नजर से देखती है और उसी को सही मानने को कहती है। ये तो किसी और के हिसाब से अपनी जिन्दगी जीना हुआ! 

कुछ का मत था कि किसी अपने की राय को सुनना अपनी दृष्टि को विस्तार देना है, तस्वीर को पूरी देखने की एक कोशिश। हो सकता है हम किसी बात का वो पक्ष देख ही नहीं पा रहे हों। प्रकृति वो भी हमारे सामने रखना चाहती हो  ऐसे में उसकी राय को नहीं सुनना तो अपने निर्णयों को कमजोर और अपनी सफलता को संदिग्ध बनाना ही होगा! बेहतर है हम सब की नहीं पर अपनों की तो सुनें, उसे अपने सन्दर्भों में सोचें, और ठीक पायें तो अपनायें। यही फूल प्रूफ स्ट्रैटेजी हो सकती है। 

एक ने कहा, कोई बात ऐसी नहीं होती जिसका ताल्लुक बस हम से ही होता है। और हर बात में कोई एक लीडर होता है जिसकी राय निर्णायक होनी ही चाहिए। इन सब के बीच वे जो ध्यान और धैर्य से सुन रही थी, उन्होंने कहा, 'निर्भर करता है।' जीवन में कई बातें ऐसी होती है जिनमें तो मैं किसी की नहीं सुनुँगी। चाहे किसी को भी ठीक न लगे, मुझे मालूम होता है कि मैं जो कर रही हूँ वो सही है, और उसके बिना मैं नहीं रह सकती। हाँ, उसके अलावा की बातों में मैं सुनुँगी ही नहीं, मानूँगी भी। यहाँ तक कि कोई हर्ज नहीं होगा तो वो भी जिन्हें मैं ठीक नहीं समझती लेकिन मेरी है वो तो मेरी ही है। 

वे फीमेल बाइक राइडर हैं, हाल ही मैं 9,000 कि.मी. की सोलो राइड करके आयीं हैं। बाइक राइडिंग उनका जुनून हैं, वे उसी परिपेक्ष्य में बात कर रही थी। वे कह रही थी कि इसके बिना मैं नहीं रह सकती इसलिए मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसकी क्या राय है। 
घर आकर जब मेरे जेहन में सारी बातों का रिपीट टेलीकास्ट चल रहा था तो लगने लगा ऐसा तो हम सब के साथ में है। कुछ बातें हम सबकी हैं जो हमें करनी ही होती हैं। जिनके बारे में हमें कोई सन्देह नहीं होता; न ये कि मैं कर रहा हूँ वो सही है या नहीं और न ही ये कि ये मुझसे हो पाएगा कि नहीं। उनमें मेरा विश्वास नहीं आस्था होती है।  

और तब जो मैं समझा वो ये कि ये ही वे बातें होती हैं जो हमारा होना होती हैं। इन्हीं से हम अपनी सम्पूर्णता पाते हैं, यही वो खिड़की होती से जिससे खुशियों की रोशनी हमारी जिन्दगी के भीतर आती है। यही हमें करना होता है और यही वे बातें होती हैं जिसके लिए हम इस बार आये हैं, जैसे बाइक राइडर होना उनका होना हैं। 
तो, एक रास्ता यह भी है पता करने का कि हमें जिन्दगी में करना क्या है,- वो बात जो हम इतनी शिद्द्त से चाहें कि किसी की भी राय का हमें फर्क न पड़े। 

दैनिक नवज्योति स्तम्भ-'जो मैं समझा' 
(रविवार, 20 मई 2018 के लिए)

Friday, 25 May 2018

अपना साज अपनी राग






करीब दस दिन पहले की बात है अचानक से वो किताब मुझसे टकरा गयी। सोचा नहीं था पर इन्तजार तब से था जब से मैंने उसके लेखक विश्व-प्रसिद्ध जीव वैज्ञानिक ब्रूस लिप्टन का इंटरव्यू पढ़ा था। वे विस्तार से खुलासा कर रहे थे कि हमारा जीवन, तौर-तरीका, आदतें हमारी आनुवांशिकता पर नहीं हम कैसी ऊर्जा के साथ जीते हैं, पर निर्भर करती हैं। हम मानते आए हैं कि हम जैसे है उसके लिए मुख्यतः हमारे 'जीन्स' ही जिम्मेदार होते हैं लेकिन वे कह रहे थे सचमुच ऐसा है नहीं। जीन्स तो हमारे होने के नक्शे भर होते हैं, उन्हें जिस तरह हमारी कोशिकाएँ पढ़ पाती हैं उसी से ये सारी बातें तय होती हैं। और उनका ये पढ़ पाना निर्भर करता है उन कोशिकाओं की ऊर्जा पर।
अब एक मानव खरबों कोशिकाओं से बना होता है। तो, समझ लीजिए हम कैसे हैं और कैसे हो सकते हैं ये निर्भर करता है हम कैसी ऊर्जा के साथ जीते हैं उस पर, हमारे मानसिक वातावरण पर।  
यानि फिर वही बात कि हम जैसा सोचते है वैसा ही हमारा जीवन बनता चला जाता है। 

मैं भी ऐसा ही मानता आया हूँ लेकिन वे इसे विज्ञान से सिद्ध कर रहे थे इसीलिए इस किताब 'द बायोलॉजी ऑफ बिलीफ' को मैं तब से पढ़ना चाहता था। 
बड़े उत्साह से उसे शुरू किया लेकिन थोड़ी ही देर में लगा जैसे, जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ रहा हूँ पिछला चूकता जा रहा है। लगा, शायद इसकी अँग्रेजी क्लिष्ट है या मेरी आदत छूट गयी है। कोई शब्द ऐसा तो नहीं था जो मुझे आता न हो फिर भी मैं उनके साथ नहीं जा पा रहा था। शुरू के कुछ पेज आँखे गड़ाकर पढ़े पर मन सन्तुष्ट नहीं था, वापस पढ़े, फिर पढ़े पर उनके अर्थ मेरे नहीं हो पा रहे थे। 
जरूर, मेरी अँग्रेजी पढ़ने की आदत ही छूट गयी है!

मैं जाँचने के लिए डॉ. वेन डब्ल्यू. डायर की एक किताब ले आया। वे मेरे पसंदीदा लेखक है, लेखक क्या गुरु ही हैं। पढ़ना शुरू किया, तो रफ्तार ऐसी बनी जैसे प्रेमचन्द को पढ़ रहा हूँ। याद ही नहीं रहा कि हिन्दी पढ़ रहा हूँ या अँग्रेजी। अब किताब रखी तो दूसरी समस्या शुरू हो गयी। ये क्या था? एक किताब के साथ टेबल-कुर्सी पर बैठ आँखे गढ़ाने पर भी सुर नहीं बन्ध रहा था तो दूसरी के साथ बिना कोशिश जुगलबन्दी हो रही थी। 
और तब समझ में आया, बात दरअसल ये थी कि वो विज्ञान की भाषा थी और मैं जीवन का विद्यार्थी।

ये बात चलते-चलते हमारी पसन्द, फिर शिक्षा से होते हुए कैरियर और सफलता-असफलता तक के चक्कर लगा आयी। किसी विषय में अच्छे नहीं होने से ये निष्कर्ष नहीं निकलता कि हम पढ़ाई में अच्छे नहीं वरन इतना ही कि वो विषय मेरा नहीं। जिन्दगी की गुजर-बसर के लिए जो काम हम कर रहे हैं उससे गाड़ी नहीं चल पा रही तो इसका मतलब ये नहीं कि हम काम नहीं कर पा रहे बल्कि ये कि हमारे लिए कोई और काम है। और ऐसे ही हम असफल है इसका मतलब हमारा कमतर होना नहीं बल्कि ये कि सफलता हमारा कहीं और इन्तजार कर रही है। मैं खुद हैरत में था कि बात कहाँ की कहाँ पहुँच गयी, और जो इतनी मामूली लग रही थी वो तो जिन्दगी का मर्म समझा रही थी। 

इस तरह उन दो दिनों में जो मैं समझा वो ये कि हम सब का अपना-अपना संगीत है जो हम में 'इन-बिल्ट' है; हमारे में निहित है। संगीत का होना चिन्ता की नहीं समझने की बात है। रही बात प्रयासों की तो वे सिर्फ ये पता लगाने में करने हैं कि वो संगीत कौन सा है और किस साज से बजेगा। 

दैनिक नवज्योति स्तम्भ-'जो मैं समझा' 
(रविवार, 8 अप्रैल 2018 के लिए)

Saturday, 21 April 2018

मैं ही मेरा दोस्त





आज बात एक दुविधा की, लेकिन उससे पहले उसके बैकग्राउण्ड की। बैकग्राउण्ड ये कि जैसे शरीर की अपनी जरूरतें हैं वैसे ही मन की भी अपनी जरूरतें हैं। उसके बिना वो नहीं रह सकता। और ऐसे देखें तो स्वीकार किया जाना शायद व्यक्ति की पहली मानसिक जरुरत है। स्वीकार किया जाना, जैसे आप हैं वैसे के वैसे। जहाँ आपकी कमियाँ आपकी विशेषताएँ बन जाती है। इसलिए यही प्रेम की बुनियाद भी होती है। 
कहते हैं सबसे पवित्र प्रेम माँ और बच्चे के बीच होता है क्योंकि वे एक दूसरे के लिए पूर्ण होते हैं, जैसे है वैसे। एक माँ के लिए अपने बच्चे से सुन्दर दूसरा दुनिया में कोई नहीं होता और एक बच्चे के लिए माँ उसका अन्तिम पड़ाव होती है। 

अब दुविधा ये कि इस तरह हमारा स्वीकार किया जाना सामने से आता है। कोई और चाहिए होता है जो हमें स्वीकार करे। हमारी इस मानसिक जरुरत के लिए हम किसी और पर निर्भर होते हैं। हमें अपने घर में, अपने काम में, अपने दोस्तों में, समाज में, हर जगह ऐसे व्यक्तियों की जरुरत होती है जो हमारे होने को हामी भरें। या यों कह लें इन सारी जगहों पर स्वीकार किए जाने के लिए ही हमारी सारी जुगतें होती हैं। व्यक्ति अपनी मूलभूत जरूरतों के बाद जो कुछ करता है वो इसीलिए तो करता है! अब यहाँ मुश्किल है। ये किसी और पर निर्भरता! कोई और हमें ये अहसास दिलाए कि हम जैसे हैं ठीक हैं, यही गड़बड़ है। अब दुर्भाग्य से किसी के जीवन में ऐसे लोग न हों तो वो क्या करे? और यहाँ तक भी ठीक लेकिन यदि जीवन में ऐसे लोग हों जो हर बात में उसकी गलती निकालते हों, उसे सुधारना चाहते हों, चाहते हों कि वो अपने तरीकों से नहीं उनके तरीकों से जिए तब तो बेचारे का दम ही घुट जाएगा। मुफ्त में अपना जीवन कुण्ठा और अवसाद में गुजार रहा होगा। होगा तो वो अपने आप में बिल्कुल ठीक लेकिन महज इसलिए कि उसके जीवन में इस बात का अहसास दिलाने वाले लोग नहीं, वो ऐसे जीने को मजबूर होगा। 
ये तो कोई बात नहीं हुई! हमारा जीवन, हमारा मन, हमारी खुशियाँ क्यूँ किसी और पर निर्भर रहे! क्या हो कि हम अपने आप को ठीक, बिल्कुल ठीक माने चाहे कोई कुछ कहे। 
और कुछ ऐसा होगा भी क्योंकि प्रकृति की योजना में जब सब कुछ परफेक्ट है तो वो हमें यूँ दूसरों पर निर्भर बनाने से रही! पर वो क्या है?

सारे जवाब सवालों में ही छुपे होते हैं, शायद मेरा भी वहीं था। 
और वो छुपा था 'प्रकृति' शब्द की ओट में। 
हमें अपने दैनिक जीवन का कुछ हिस्सा प्रकृति को देना होगा। प्रकृति को देना यानि अपने आप को देना क्योंकि हम भी तो प्रकृति ही हैं। कुछ वक्त उन चीजों के साथ गुजरना होगा जिनमें कोई अहं नहीं। कुछ ऐसे काम करने होंगे जो फायदे-नुकसान से परे हैं। कभी अपरिचित लोगों के बीच जाना होना या अनदेखी जगहों के लिए निकलना होगा।
आप जब इनमें से अपने माफिक का कुछ भी कर रहे होंगे तब प्रकृति उसी लहजे में आपको ये अहसास दिला रही होगी कि मैं जैसी हूँ वैसी ठीक हूँ इसलिए तू भी जैसा है ठीक है। और तब आपको किसी और की जरुरत नहीं होगी। आप हर हाल में ठीक होंगे, बिल्कुल ठीक। 

तो जो मैं समझा वो ये कि सारी मुश्किल अपने साथ नहीं होने की है, अपने साथ कुछ देर नहीं बैठने की है। यदि हम अपने से दोस्ती कर लें तो फिर और दोस्त मिलें तो भी ठीक और नहीं मिलें तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता।

दैनिक नवज्योति स्तम्भ-'जो मैं समझा' 
(रविवार, 11 मार्च 2018 के लिए)

Thursday, 1 March 2018

एक मोहब्बत भरा दिल







एक ताजमहल और बनने को है, और इस बार इसे बनाने वाले हैं 81 वर्षीय रिटायर्ड पोस्टमास्टर साहब श्री फैजुल हसन कादरी। चौंक गए ना आप, पर ऐसा ही है। संयोग तो नहीं होगा कि उनकी महरूम बेगम का नाम भी ताजमुली ही था। खुदा को शायद मालूम रहा होगा कि ये मोहब्बत किसी दिन यूँ परवान चढ़ेगी इसीलिए उनका नाम कुरान के पन्ने पर उस दिन ताजमुली खुला होगा ! 
बेशक ये बन रहा ताजमहल बहुत छोटा है लेकिन इसकी वजह खालिस मोहब्बत है किसी शहंशाह की नुमाईश नहीं। आप ही सोचिए, एक बुजुर्ग का दिल कितना मजबूर रहा होगा जो छोटा ही सही अपनी बीवी की याद में ताजमहल बनाने निकल पड़ा। 
इस दरियादिल इन्सान से बुलन्दशहर का शायद ही कोई बन्दा होगा जो वाकिफ नहीं होगा!

ढाँचा बनने को आया था, एक दिन सुबह की बात है, क्या देखते हैं! स्कूल के हेडमास्टर साहब कुछ परिचितों के साथ दरवाजे पर खड़े हैं। समझ नहीं आया, क्या बात होगी। उन्हें पूरे आदर से अन्दर लाए, बिठाया और पूछने लगे। पर वे सब हिचकिचा रहे थे, 'आप ही कहिए, आप ही कहिए।' आखिर उनमें से एक जो कादरी साहब से थोड़ा ज्यादा सहज था कहने लगा, वो बात यूँ है कादरी साहब कि हम लोग एक लड़कियों की सरकारी स्कूल बनाने में जुटे हैं। बस अब पूरी होने को है कि पैसों की किल्लत आन पड़ी है। बड़ी मुश्किल से इलाके में एक लड़कियों की स्कूल की रजा मिली थी, कहीं ऐसा न हो सारी मेहनत फालतू हो जाए। कई 'बड़े लोगों' को टटोल आए, अब आखिर हार कर आपका दरवाजा खटखटाया है। 

कादरी साहब एक मिनट के लिए तो उलझन में पड़ गए, लेकिन मोहब्बत वाले दिमाग से नहीं दिल से फैसले लेते हैं इसलिए उन्हें ज्यादा वक्त भी नहीं लगता। उन्होंने कहा, मुझसे हो सकेगा जितनी मदद जरूर करूँगा।
और उन्होंने स्कूल के लिए अपनी जमीन का आखिरी टुकड़ा तक बेच दिया। लेकिन 'ताजमहल' रुक चुका था। कोई छह-सात लाख ही तो और चाहिए थे! स्कूल पूरा हुआ तो कादरी साहब फिर जुट गए। सहारा तो अब पेंशन का ही था इसलिए एक-एक पाई जोड़ने लगे। कुछ वक्त बीता और काम एक बार फिर शुरू हुआ। 
अभी चाल ही ठीक से नहीं बनी थी कि उनकी भतीजी की जिन्दगी में ऐसा कुछ हुआ कि कादरी साहब फिर से अपने आप को नहीं रोक पाए। करीब लाख रुपये इकट्ठा हुए थे, वे उन्होंने उसे दे दिए। 

सच्ची प्रेरक कहानियों की तलाश में अक्सर मेरी मुठभेड़ ऐसी ही अद्भुत ख़बरों से हो जाती है। इंशाअल्लाह, ये ताजमहल तो बन कर रहेगा लेकिन इस कहानी ने जो समझने का मौका दिया वो ये कि आखिर एक मोहब्बत भरा दिल होता क्या है?
और जो मैं समझा वो ये कि जो जीवन की हर खूबसूरती पर आ जाए, जो अपने किसी को तकलीफ में न देख पाए, जो दुनिया को और खूबसूरत बनाने की तड़प रखे, जो किसी मुश्किल के सामने लाचार न हो; वही सचमुच एक मोहब्बत भरा दिल है। 
वैलेंटाइन-डे और बसन्त से सही ऐसी किसी कहानी का मौसम क्या होगा लेकिन इन्हें कहना और भी जरुरी हो जाता है जब हम प्यार और मोहब्बत के नाम पर एक-दूसरे से लड़ने में यों लगे हों; फिर चाहे वो हमारा प्यार अपने धर्म, अपने समुदाय से हो या अपनी विचारधारा से हो। 

दैनिक नवज्योति स्तम्भ-'जो मैं समझा' 
(रविवार, 11 फरवरी 2018 के लिए)

Saturday, 3 February 2018

मैं खुश रहूँगा






'अरे! आप', उसने कहा था। हम दोनों अक्सर किताबों पर होने वाली हमारी मासिक गोष्ठी में मिला करते थे। कुछ देर इधर-उधर की बातें हुईं और फिर किताबों पर आकर ही ठहर गई। हम कोई साज बजा लें आखिर राग अपना ही अलापने लगते हैं। लेकिन इस बातचीत का एक तीसरा पक्ष भी था। उसके साथ एक वृद्ध आए थे, पद्माकर जी। मैं नहीं मिला था पहले उनसे कभी लेकिन जाने कितने वर्षों बाद इतना भावपूर्ण सन्तुष्ट चेहरा देखा था। हमारे चेहरे तो ऐसे नजर आते हैं जैसे सर पर सौ-दो सौ किलो का सामान रखा हो और बेचारी चेहरे की मांसपेशियाँ बस उसे ही सहन करने में लगी हों। उनकी बातें इतनी आनन्द से भरी थीं कि कुछ ही समय में लगने लगा था कि हम एक-दूसरे को न जाने कब से जानते हैं। 

उन्होंने जो बताया वो ये था कि वो वहीं पीछे ही अपने बेटे के यहाँ आए हुए हैं। करीब तीन महीने रहेंगे। उम्र 84 वर्ष है, सुबह घूमने जाते हैं लेकिन बूढ़ों के साथ नहीं घूमते। जवाब देते हैं, "मैं बूढ़ा हो जाऊँगा तब तुम्हारे साथ घूमूँगा", रेल्वे की नौकरी से रिटायर हुए हैं और पति-पत्नी अजमेर रहते हैं। 
उनके जाने के बाद सोचने लगा, कितनी परफेक्ट लाइफ है अंकल की। इस उम्र में पति-पति का साथ बना हुआ है, बिना किसी सहारे के अपनी जगह पर रह पा रहे हैं, स्वस्थ हैं, पेंशन मिल रही होगी, शायद यही इनके इतने खुश, इतने सन्तुष्ट होने की वजह है। 
पर जो हो मैं उनसे प्रभावित था। 

कुछ दिनों बाद फिर वे एक दिन आये। वे वैसे ही आये थे लेकिन मेरी जिज्ञासा उनके इतने खुश, इतने सन्तुष्ट रहने के राज जानने की थी। किताबों की बातों को मैंने उनके जीवन तक पहुँचाया और उनसे पूछने लगा। 
लेकिन जो कुछ मालूम चला वो तो कुछ और ही था! 
आंटी को पार्किन्सन था, इस हद का कि डॉक्टर्स ने दस साल पहले ही कह दिया था कि बेहतर है आप ईलाज न लें। मरीज की उम्र बढ़ाना उसे तकलीफ देना होगा। एक ऐसा व्यक्ति जो अपने हरे-भरे दिनों में अपनी दिनचर्या के लिए पूरी तरह अपनी पत्नी पर निर्भर था, पिछले दस सालों से अपनी पत्नी का यों ध्यान रख रहा था, यों सेवा कर रहा था कि उनकी बीमारी आज भी नियन्त्रण में थी। इन सब के बावजूद वो अपनी जगह, अपने घर अजमेर में ही रहना चाहता था क्योंकि सुविधा से ज्यादा उसे स्वतन्त्रता प्यारी थी। वे कह रहे थे कि मैं घूम कर लौटूँ तब मेरे नाश्ते का समय हो न कि मुझे नाश्ते के समय लौटना पड़े। दुख है उन्हें तो बस एक बात का कि मैं चला गया तो इसका ध्यान कौन रखेगा? लेकिन वे जिन्दादिल हैं। हर बात में हँसी ढूँढ़ते हैं। आप को उनके साथ बैठकर लगता है कि मैं कितने दिनों बाद अपनी स्वाभाविक हँसी हँसा हूँ। 

उनसे मिलना एक अनुभव है और उनसे मिलकर जो मैं समझा, एक बार फिर से, वो ये था कि स्थितियाँ कभी परफेक्ट नहीं होती। वे सबके लिए, सबके साथ जिन्दगी भर खट्टी-मिट्ठी बनी रहती हैं। हमारा खुश होना हमारी जिन्दगी की परिस्थितियों पर कभी निर्भर करता ही नहीं है कि जिसकी अनुकूल है वो खुश है और जिसकी नहीं वो नाखुश। खुश होना हमारा निर्णय होता है, जिन्दगी के जैसे दौर से भी हम गुजर रहें हो उसके बीच। 
और जिन परिस्थितियों को हम नहीं बदल सकते वे खुश रहने से भी बदलती तो नहीं लेकिन तब उनके साथ जीना बहुत, बहुत आसान हो जाता है। फिर कौन है जिसको सब मिला है, जिसको कोई दुख नहीं लेकिन फिर भी कुछ लोग खुश, सन्तुष्ट नजर आते हैं और कुछ परेशान, थके-थके क्योंकि कुछ ने खुश रहना चुना होता है और कुछ ने नाराज रहना। तो बात सोचने कि है कि हम हमारे लिए खुशी के अलावा कुछ और चुन ही कैसे सकते हैं! 
​राहुल हेमराज_

दैनिक नवज्योति; कॉलम- 'जो मैं समझा' 
(रविवार, 14 जनवरी 2017 के लिए)

Saturday, 27 January 2018

आस्था का विज्ञान





कई वर्षों बाद अपने एक पुराने मित्र से मिलना हुआ। वे अपनी माता जी से अगाध प्रेम करते हैं, ये बात मैं शुरू से जानता था। उनकी माता जी को अपने अन्तिम वर्षों में लकवा मार गया था। उन वर्षों में मेरे मित्र ने उनकी उतने ही लगन से सेवा की जितने जतन से उन्होंने कभी उन्हें पाला-पोषा होगा। पर इस बार जो मालूम चला वो प्रेम नहीं भक्ति है। जब लगने लगा था कि अब उनकी माता जी कभी भी जा सकती है उन्होंने मलमल के सफेद कपड़े पर केसर के पानी से उनके पगलिए ले लिए थे, और वो भी कई-कई सारे। यानि केसर के पानी से उनके पगों के निशान। वे हर खास जगह उन्हें रखते हैं, अपने घर में-अपने ऑफिस में और कोई नई शुरुआत हो तब भी सबसे पहले स्थापना उन्हीं की होती है। उनका मानना है कि कहीं भी उन पगलियों का होना साक्षात् उनकी माताजी का होना है, और जब तक वे हैं, उनका कुछ नहीं हो सकता। उनका काम बन के ही रहेगा। मुश्किलें आएँगी तो मदद वे भेजेंगी। कैसे? ये उनकी चिन्ता का विषय नहीं है। उन्हें तो बस, आगे बढ़ते जाना है। 

पहली बार जब वे मुझसे ऐसा सब कह रहे थे तब मुझे भी ये निरा अन्धविश्वास ही लगा था। पर जितने जोर से वे कह रहे थे, और उनके जीवन में जब-तब हुए उन पगलियों से हुए चमत्कारों की कहानियाँ सुना रहे थे मेरे दिमाग से ये बात उनके जाने के बाद भी न जाने कब तक बनी ही रही। बात दिमाग के पास थी तो भला कैसे बचती! और धीरे-धीरे मुझे इसके पीछे का विज्ञान दीखने लगा। 

वो आस्था उनके सोच को स्पष्टता और इरादों को दृढ़ता दे रही थी। उन्हें अपने मन में कोई सन्देह था ही नहीं। उनका पूरा ध्यान किसी भी काम में बस इस बात पर ही रहता था कि उसके लिए उन्हें करना क्या-क्या है। कौन से तरीके सबसे सुगम होंगे। वे हमेशा स्पष्ट रहे कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं। क्योंकि काम तो हो जाएगा, उसे करने या न करने का निर्णय सिर्फ इस बात पर टिका होता था कि क्या सचमुच ये काम मैं करना भी चाहता हूँ! ऐसे काम वे ही होते हैं जिनकी आवाज अन्दर से आती है और अन्दर से आवाज उन्हीं के लिए आती है जो आपके लिए बने हों। और ये बात हम जो भी करते हैं उस पर भी जस की तस लागू होती है। 

जब किसी का भी मानसिक वातावरण ऐसा हो तो उसकी सफलता असन्दिग्ध हो जाती है, जिसे वे श्रद्धा से अपनी माँ का स्नेह और आशीर्वाद कहते हैं। तब लगने लगा ये सारी बातें बेमतलब नहीं होती, इन सब के पीछे अपना विज्ञान होता है। ये हमारे विश्वासों को अखण्ड बनाए रखने के सुन्दर बहाने होते हैं। पर हाँ, जब हम कर्म से विमुख हो इनके भरोसे हाथ पर हाथ धरे बैठ जाते हैं, इन्हीं की पूजा को सफलता का पर्याय समझने लगते हैं तब इन आस्थाओं को अन्धविश्वासों में बदलते देर नहीं लगती। 

तो जो मैं समझा वो ये कि आस्था सफलता का मन्त्र है, अंधविश्वासों का दूसरा नाम नहीं यदि हम उससे स्पष्ट हुई सोच और दृढ़ हुए इरादों को अपनी ऊर्जा बना लें। जब हम बिना सन्देह के कुछ भी करने या न करने का निर्णय इस बात पर लेने लगें कि क्या मेरा वैसा करना मेरे लिए उचित होगा? क्या वो मुझे ख़ुशी देगा? 
बस यहाँ तक ही नहीं, ये भी कि किसी न किसी बात में तो हमारी आस्था होनी ही चाहिए। जरुरी नहीं वो किसी श्रद्धा में ही हो, वो किसी के साथ में, किसी की सलाह में या ऐसी ही किसी और बात में हो सकती है पर होनी जरूर चाहिए। बिना आस्था के आप कितनी ही सफलता पा लें, वो लेशमात्र ही सही कम तो होगी जितनी हो सकती थी। 

(दैनिक नवज्योति; रविवार, 10 दिसम्बर 2017 के लिए)