Saturday, 22 December 2012

छोटी चाबी बड़ा खजाना




" जो रुकना जानता है वही खतरों से बचता हुआ लम्बा चल पाता है। "                                 -- लाओत्से 
                                                                                                           ( ताओ ते चिंग - सूत्र 44 से )


चढना,उठाना, बढ़ना इंसान की प्रकृति है, यही सिखाया भी जाता है और ठीक भी माना जाता है लेकिन उतरना चूँकि उसकी प्रकृति के विरुद्ध है और लोक-जीवन में इसे असफलता का पर्याय समझा जाता है इसलिए न तो व्यक्ति सीखना चाहता है और न ही इसे ठीक माना जाता है, लेकिन क्या ये सचमुच इतना गैर-जरुरी है? हम अपने चारों ओर नज़र घूमाकर देखें तो ऐसे कई महान खिलाडी, अभिनेता, राजनीतिज्ञ वगैरह मिल जायेंगे जिन्हें रुकना नहीं आया और उनकी विदाई उतने सम्मानजनक ढंग से नहीं हो पाई जिसके वे सचमुच हकदार थे। यहाँ तक कि उनका अपने आपको थोपना उनकी उपलब्धियों को कम कर गया।

एक पर्वतारोही की सफलता पर्वत के शिखर तक पहुँचने में होती है लेकिन क्या तब वो सिर्फ पहाड़ पर चढ़ना ही सीखें। कल्पना कीजिए उसने ऐसा ही किया तो क्या होगा? वह चोटी पर पहुँच तो पाएगा लेकिन वहीँ रह जाएगा, जिन्दगी से बहुत दूर। हकीकत तो यह है कि एक पर्वतारोही को चढ़ने की बजाए उतरने की ज्यादा तैयारी करनी होती है क्यांकि उतरना ज्यादा जोखिम भरा होता है। एक तो चढने की थकान दूसरी लक्ष्य-हीनता और ऊपर से फिसलने का डर।

मेरी ही एक कमजोरी ने इस सच से मेरा वास्ता करवाया; सभी कहते थे कि मैं अच्छा बोलता हूँ लेकिन मुझे दुःख होता था कि फिर मेरी बात उतनी प्रभावी क्यों नहीं होती? धीरे-धीरे समझ आया कि मुझे सही समय पर अपनी बात ख़त्म करना नहीं आता था। आज भी श्रम जारी है। अब लगता है यह बात तो जीवन के हर पहलू पर जस की तस लागू होती है चाहे वह हमारी सफलता-समृद्धि जैसी महत्वपूर्ण बातें हो या फिर रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातें जैसे 'पसंद का खाना हो तो भी कितना खाएँ' या 'कितने घंटे काम करें' या फिर 'घूमने ही कितने दिनों के लिए जाएँ' वगैरह-वगैरह। किसी भी चीज का आनन्द भी तभी आता है जब हमें सही समय पर रुकना आता हो।

अब सफलता को ही ले लीजिए। कौन नहीं चाहता कि उसकी सफलता का ग्राफ ऊपर उठता ही चला जाए लेकिन क्या कभी ऐसा हुआ है? हर व्यक्ति का एक दौर और हर विचार का एक समय होता है उसके बाद उसकी जगह नए व्यक्ति और नए विचार लेते है। इसका मतलब यह कतई नहीं कि वह व्यक्ति चूक गया है। यह तो प्रकृति का आधारभूत नियम है इसलिए वह किसी भी तरह अपने आपको दोषी ठहराए या मन में हताशा का कोई भाव लाए इसका तो कोई कारण ही नहीं बनता। उल्टा वे व्यक्ति जो अपनी असफलता के दौर में ही इस बात को समझ लेते है और अपने थमने की तैयारी रखते है वे ही लम्बे समय तक याद रखे जाते है। अच्छा रहता है, हम जाएँ तो कोई हमें रोके, हमारे जाने के बाद हमारी कमी महसूस करे बनिस्पत इसके कि कोई ये सोचे कि हम जाते क्यूँ नहीं?

इससे दीगर सबसे अहम् बात यह है कि आप सफल ही होते चले गए तो सफलता का आनन्द कब लेंगे। यह तो ठीक वैसी बात है कि स्वादिष्ट खाने को इतने जतन से बनाया कि जब खाने की बारी आई तब थक कर नींद आ गई।

अपनी प्रकृति और अहं के विरुद्ध इस गुण को अपनाने की शुरुआत हम रोजमर्रा की छोटी-छोटी कोशिशों जैसे कितना खाएँ, बोलें या काम करें, से कर सकते है। इस तरह सही समय और सही जगह पर रुक पाना हमारे स्वाभाव में शामिल हो जाएगा और हम सफलता और समृद्धि जैसे जीवन के महत्वपूर्ण एवम नाजुक विषयों को भी कुशलता से संभल पाएँगे। ये उस बड़े खजाने की छोटी सी चाबी है जिसमें प्रभावशाली और आनन्दमय जीवन का राज छुपा है।


( रविवार, 16 दिसम्बर को नवज्योति में प्रकाशित )
आपका
राहुल .......... 

Friday, 14 December 2012

आम आदमी और ईमानदारी



आज इस समय जब देश में सबसे अहम् मुददा भ्रष्टाचार बना हुआ है तब सबसे ज्यादा दुविधा में है तो वह है आम-आदमी। उसकी स्थिति बिल्कुल 'एक तरफ कुआँ और एक तरफ खाई' जैसी है। यहाँ तक कि वो ईमानदारी की परिभाषा को लेकर भी भ्रमित है। यह भी सच है कि भ्रष्ट कोई होना और कहलाना नहीं चाहता क्योंकि भ्रष्ट कोई पैदा नहीं होता। हमारी ही व्यवस्था के कुछ नियम-कानून इतने अव्यावहारिक और कुछ इतने अप्रासंगिक हो चले है कि उन्हें निभाते हुए एक आम-आदमी के लिए अपनी जिन्दगी की गाड़ी ढंग से चला पाना लोहे के चने चबाने से कम नहीं, खासतौर से वे नियम-कानून जो उसके जीविकोपार्जन से जुड़े है।

यही उसकी दुविधा है कि यदि वह नियमों की व्यावहारिक अवहेलना करता है तो भी वह बेईमानों की उस श्रेणी में शामिल हो जाता है जो अपने पद और अधिकारों का नाजायज फायदा उठा देश और समाज को खोखला कर रहे है तो उसके लिए अपने पारिवारिक और सामाजिक उत्तरदायित्वों को सम्मानपूर्वक निभा पाना संभव नहीं। अब हर किसी व्यक्ति का जिन्दगी के प्रति नजरिया एक समाज-सुधारक का हो यह न तो संभव है और न ही उचित, और फिर यह व्यक्ति का मौलिक अधिकार है कि वह स्वयं चुने कि वह अपनी जिन्दगी कैसे जिएगा?

सबसे पहले तो यह विचार करना होगा कि नियम-कानून बनाए ही क्यूँ जाते है? नियम-कानून देश और समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना और रक्षा के लिए बनाए जाते है ठीक उसी तरह जिस तरह माता-पिता अपने बच्चों में अच्छे संस्कारों के लिए घर में अनुशासन का वातावरण बनाते है। साफ़ जाहिर है कि नियम परक होने से ज्यादा अहम् है नीति-संगत होना। नीति-संगत वही है जिसके कर्म उसके प्राकृतिक गुणों यानी दया, प्रेम, करुणा और समानता के रंगों में रंगे हो या सीधे-सच्चे शब्दों में जो किसी का बुरा न चाहे। व्यक्ति कुछ भी करे तो उसे अपने हित के साथ यह भी ध्यान रहे कि इसमें किसी और का अहित तो नहीं। इस तरह नियमों को नैतिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में समझते हुए हमें ईमानदारी की नई परिभाषा गढ़नी होगी। अपने जीवन में मूल्यों को नियमों के ऊपर रखना होगा। ईमानदार व्यक्ति वह है जिसका आचरण नीति-संगत है चाहे पूरी तरह नियम-परक न हो।

मैं अपने इस दृष्टिकोण के पक्ष में आपसे इतना पूछना चाहता हूँ की क्या नमक कानून तोड़ने वाले गाँधी से, गुलामी प्रथा का विरोध करने वाले अब्राहम लिंकन से और म्यांमार की सरकार को सरकार ही न मानने वाली आन सानं सू की से सद्चरित्र और ईमानदार भला कोई हो सकता है? लेकिन यह भी सच है कि हर व्यक्ति के लिए व्यवस्था के विरोध में खड़े हो पाना सम्भव नहीं इसलिए आपको एक बात विशेष रूप ध्यान रखनी होगी कि आप अपनी मान्यताओं का अनावश्यक प्रचार न करें। ऐसी मान्यताएँ जो नीति-संगत तो है लेकिन पूरी तरह नियम-परक नहीं वरना आप अपने और अपने परिवार के लिए मुसीबतें खड़ी कर लेंगे और आपका जीना दूभर हो जाएगा।

आपका जीवन मूल्यों पर आधारित हों और कर्म प्राकृतिक गुणों से रंगे। यदि आपका आचरण नीति-संगत है चाहे पूरी तरह नियम-परक नहीं तो भी आप शत-प्रतिशत ईमानदार है। कोई कारण नहीं बनता कि आप अपने मन में किसी तरह का ग्लानि-भाव रखें। ऐसा जीवन जी कर आप महापुरुषों के बताए रास्ते पर ही चल रहे होंगे।


( जैसा कि रविवार, 9 दिसम्बर को नवज्योति में प्रकाशित )
आपका 
राहुल ........   



Friday, 7 December 2012

आत्म-सम्मान ~ पहला धर्म




        .......... और कसाब को फाँसी हो गई। पहली बार किसी के मरने पर अच्छा  रहा था। हर चेहरे पर एक मुस्कान तैर रही थी कुछ लोगों ने तो पटाखे छोड़े और एक-दूसरे को मिठाइयाँ खिलाई। मुझे भी पक्का विश्वास था कि मेरा खुश होना जायज है लेकिन इस घटना ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर कसाब की फाँसी ने एक आम आदमी को ऐसा क्या लौटा दिया कि पूरा देश एकजुट होकर उसके फाँसी चढ़ जाने का जश्न मना रहा था?

हम आज तक स्वयं के ईश्वर की अभिव्यक्ति, क्षमा के सबसे सुन्दरतम भाव, चेतना के भिन्न स्तरों की बात करते आये है फिर उसका गुनाह अक्षम्य क्यूँ था? क्या उसका गुनाह केवल बेगुनाहों की मौत था या उससे बढ़कर और कुछ था? सवाल है तो जवाब भी होगा और आखिरकार अन्तस में बैठा मिल ही गया और वह है ; आत्म - सम्मान। वह हमला किसी व्यक्ति पर नहीं देश के प्रत्येक व्यक्ति के आत्म-सम्मान पर था। उसने देश के हर नागरिक को लज्जित किया था कि कोई भी ऐरा - गैरा नत्थू - खैरा आएगा और जो चाहेगा करके चला जाएगा। कसाब की फाँसी ने हमारे आत्म - सम्मान को लौटाया।

आइए, थोडा पीछे लौटते है; कृष्ण जब धृतराष्ट्र के पास पाण्डवों के लिए 'पांच गाँव' का संधि-प्रस्ताव लेकर गए और कौरवों ने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था तब क्या उन राजाओं की कमी होगी जो पांच गाँवों के बदले पाण्डवों की मित्रता और कृष्ण का सामीप्य पा लेते? क्या महाभारत पांच गाँवों को हासिल करने के लिए हुआ था? नहीं, कृष्ण के प्रस्ताव को ठुकराना पाण्डवों के आत्म-सम्मान को नकारना था और यही महाभारत की वजह थी। श्री कृष्ण ने हमें बताया कि आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए युद्ध ही अंतिम विकल्प हो तो उसे अपनाने में भी गुरेज नहीं होना चाहिए।

व्यक्ति के आत्म-सम्मान से बढ़कर कुछ नहीं। इतना अहम् की इसके लिए क्षमा, समानता और जीने के अधिकार जैसे आध्यात्मिक गुणों की अवहेलना भी जायज है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस परम सत्य के बावजूद कि हम सब परमात्मा की स्वतंत्र अभिव्यक्ति है यानि हम सब में उस एक ही परमात्मा का अंश है, हम अभिव्यक्ति और अनुभूति के स्तर पर स्वतंत्र एवं भिन्न है और इसलिए हमारा पहला धर्म है अपने स्वयं के सम्मान की रक्षा कर उस परमात्मा का सम्मान करना जिसका हमारे भीतर मौजूद अंश हमारे जीवित होने की वजह है।

यदि हम भी अपने जीवन में किसी के आदर में स्वयं की अवहेलना करते है तो समझ लीजिये हमने आदर को सही अर्थों में समझा ही नहीं। आप ही सोचिये, जिनका हम आदर करते है क्या वे खुश होंगे जब उन्हें पता चलेगा कि हम वह सब कुछ अपना मन मारकर कर रहे है? ऐसा कर हम उलटा उनका दिल ही दुखाएँगे। ऐसे लोग जो चाहते है कि आप अपनी अवहेलना करके भी उनका आदर करें, सच मानिए वे आपसे प्रेम ही नहीं करते। वे या तो आपको अपनी अहं तुष्टि का या अपना काम निकालने का जरिया भर समझते है। ऐसे लोगों को अपनी  से खदेड़ निकालना अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करना ही होगा। विश्वास मानिए, जो व्यक्ति आत्म-सम्मान से जीते है वे ही किसी का सच्चा सम्मान कर सकते है और एवज में सच्चा सम्मान पा सकते है।


(रविवार, 2 दिसंबर को नवज्योति में प्रकाशित)
आपका
राहुल........

Friday, 30 November 2012

हर साज की अपनी तान




जिन्दगी है, परिवार है तो आवश्यकताएँ भी है और आवश्यकताएँ है तो उन्हें पूरा करने के लिए धन की जरुरत है और उसके लिए किसी ऐसे काम में होना जरुरी है जो हमें जरुरत का धन दिला सके इसलिए हम अपने जीवन में कौन सा काम करें इसका पैमाना उससे मिलने वाला धन होता है। ठीक लगता है लेकिन ये तर्क क्या सचमुच उतना ठीक है जितना लगता है? ठीक लगता है लेकिन ये तर्क क्या सचमुच उतना ठीक है जितना लगता है?  दिल की सुनें, अपने सपनों  को जिएँ .............ये सब क्या कहने-सुनने की बातें है?

इस कड़ी को थोडा आगे बढ़ाते है। कौन-सा काम हमें कितना धन दिलाएगा ये हम कैसे तय करते है? निश्चित रूप से, औरों को देखकर। फलाँ व्यक्ति ने फलाँ काम कर कितना पैसा कमाया। मुझे लगता है बाकी बातें तो अपनी जगह ठीक है पर बस इस आखिरी पायदान पर आकर हमसे गलती हो जाती है। आपकी समृद्धि सिर्फ और सिर्फ उसी काम से संभव है जो आपके लिए बना है। हो सकता है जिस व्यक्ति की सफलता और समृद्धि को देखकर आप काम चुन रहे हों वो उसके लिए बना हो, आपके लिए नहीं। निस्संदेह आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन की अनिवार्यता को नकारा नहीं जा सकता लेकिन इससे अधिक की तृष्णा वह भी यह सोचकर कि यह जीवन मैं खुशियाँ लाएगा, बिल्कुल बेतुकी है। खुश रहना व्यक्ति का आत्मिक भाव है इसका धन या किसी और बाहरी परिस्थिति से कोई लेना-देना नहीं। तो धूम-फिरकर प्रश्न फिर वहीँ आकर ठहर गया कि हम कौन सा काम चुनें? 

खलील जिब्रान कहते है, " बाँसुरी बन कर काम करें जिसके हृदय से घंटों फूँकने का जतन संगीत बनकर निकलता है। जिन्दगी का गूढ़ रहस्य है उसे मेहनत के जरिए प्यार करना। आपका काम आपके आत्मिक प्रेम का इजहार हो, यही संतुष्टि देगा।"

आप अपने जीवन में वो काम करें जिसकी आप बाँसुरी है और फिर एक दिन आपका काम स्वयं संगीत की तरह बोलने लगेगा। हर व्यक्ति हर काम की बाँसुरी नहीं होता। आप उस काम को चुनें जो आपको बजाकर उसमें से संगीत निकाल दें। जिसे आप रियाज की तरह कर सकें, जहाँ न समय का भान हो न भूख का और न ही परिणामों की कोई चिंता, बस इच्छा हो तो सिर्फ मीठी तान की। यही जीवन में खुशियाँ लाएगा, यही संतुष्टि देगा। दूसरी ओर, यदि भीतर झाँकें यानी आत्म का अध्ययन करें यानी अध्यात्म की नज़र से देखें तो पाएँगे कि व्यक्ति का सार-तत्त्व, उसकी मूल-प्रकृति है -- विशुद्ध प्रेम। कोई भी व्यक्ति या तो प्रेममय है और यदि किसी और स्थिति में है तो चाह प्रेम की ही है और यही सबूत है 'विशुद्ध प्रेम' के  प्रकृति होने का अतः स्वाभाविक और आवश्यक है कि हमारा काम हमारे प्रेम का इजहार हो। जब ऐसा होगा तब हम अपने काम में सिर्फ सर्वश्रेष्ठ होंगे।

व्यक्ति के साथ उसके काम का जन्म होता है इसलिए आपकी जिन्दगी की आवश्यकताएँ उतनी ही होती है जो उस काम से पूरी हो सकें या यों कह लें कि आपके काम में हमेशा ही उतनी क्षमता होती है कि वो उन्हें पूरा कर सकें। हाँ इतना जरुर है, व्यक्ति को ये स्वयं ही ढूँढना होता है कि वो किस तरह अपने पसंद के काम को अपने जीविकोपार्जन का साधन बना सकता है और यही व्यक्ति का सच्चा पुरुषार्थ है। आपकी बाँसुरी को सुनने वाले आप ही को  ढूँढने होंगे।


(जैसा कि रविवार, 25 नवम्बर को नवज्योति में प्रकाशित)
आपका,
राहुल........ 

Friday, 23 November 2012

जीना इसी का नाम है





' जब मृत्यु आये तो आप चिरनिंद्रा के लिए जमीन की बजाय लोगों के दिलों में जगह की चाह रखें।'
                                                                                                                       -- रूमी 

दिवाली अभी तक ज़ेहन से गयी नहीं और जो बात रह-रहकर मन में उठ रही है वह है रावण की अमर होने की इच्छा। बात उठी तो उसने सोचने पर मजबूर किया कि क्या अमर होने की इच्छा गलत थी? गलत तो नहीं हो सकती क्योंकि हम सब भी तो कहीं न कहीं चाहते है कि अपने जाने के बाद याद रखे जाएँ और फिर हम सबके जीवन में ऐसे लोग रहे है जिनकी याद आज भी मुश्किल घड़ियों में हमें सम्बल देती है और उनका जीवन प्रेरणा। हमारी ऐसी चाह बिल्कुल निर्दोष है लेकिन रावण ने अमरता को जिन मायनों में समझा और फिर उसके लिए जो रास्ता अपनाया शायद वही गलत था जो अन्ततः उसके सर्वनाश का कारण बना।

रावण अपने शारीर के जरिए अमर होना चाहता था जो संभव ही नहीं। आप अमर हो सकते है किसी की यादों में और किसी को याद आएँगे उसके दिल में जगह बनाकर। आप ऐसा कुछ करें कि आपके जाने के बाद कोई आपके बारे में सोचे और एक विचार बनकर आप उसके जेहन में उपस्थित रहें। किसी के दिल में उतरना है तो सबसे पहले रावण की तरह बनाई अपनी झूठी छवि से मुक्ति पा अपनी मूल प्रकृति को जीना होगा। हम सब अलग-अलग तरह से अपनी एक छवि गढ़ लेते है। कोई अपनी सफलताओं को, कोई अपनी शारीरिक सुन्दरता को तो कोई अपने अर्जित ज्ञान को अपना परिचय बना लेता है। इस परिचय के अनुरूप ही हम व्यवहार करने लगते है; यह भूलकर कि हमारी प्रकृति है विशुद्ध प्रेम और हमारे व्यवहार सिर्फ प्रेम की उपज होने चाहिए। हम जब भी किसी से मिलें परिचय के इस बोझ को उतारकर पूरी आत्मीयता से मिलें। कोई आप से कुछ कह रहा है तो उसे अपना सम्पूर्ण अखंडित ध्यान दें। आप कुछ कहें तो वह खानापूर्ति के लिए नहीं हो बल्कि आप उसमें पूरा विश्वास रखते हों। दुनिया में किसी को भी दी जा सकने वाली इससे कीमती भेंट और कोई हो नहीं सकती। 

इस तरह आप लोगों के दिलों में उतर तो गए लेकिन वहाँ अपना पक्का ठौर बनाना है तो कुछ ऐसा कर गुजरना होगा कि उनके जीवन की कुछ खुशियों के कारण आप हों। निस्संदेह व्यावहारिक जीवन की अपनी मजबूरियाँ होती है अतः आपके काम सबसे पहले आपकी जरूरतें और जिम्मेदारियाँ पूरी करें लेकिन उसके एक छोटे से हिस्से का मेहनताना  सिर्फ दूसरों की खुशियाँ हो। गीता में इसे लोक-संग्रह के कार्य कहा गया है। ऐसे काम जो दुनिया के पहिए को घुमाने के लिए जरुरी हों। आप भी अपना अंशदान दीजिए। आप जिस भी क्षेत्र में है उसी में रहकर ऐसा कर सकते है, अलग से कुछ भी करने की जरुरत नहीं।

दूसरों की खुशियों के लिए किया छोटा-सा काम भी आपको इतनी आत्म-संतुष्टि देगा कि तब आप महसूस करेंगे कि इसे तो और किसी विधि से हासिल किया ही नहीं जा सकता। अपनी अभिव्यक्ति का आधार अपनी प्रकृति को बनाइए, प्रेम के केनवास पर जिन्दगी के चित्र उकेरिए। जब ऐसा होगा तो दूसरों के चेहरे की उदासी आपके मन को विचलित करने लगेगी और जिस दिन से ऐसा होने लगे समझ लीजिएगा आपने अमरता का रास्ता ढूंढ़ लिया। आपसे बात करते हुए मेरा मन फिल्म 'अनाडी' का वो सुंदर गीत गुनगुनाने लगा है ......

किसी की मुस्कराहटों  पे  हो निसार 
किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार 
किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार 
जीना इसी का नाम है ................  


(रविवार, 18 नवम्बर को नवज्योति में प्रकाशित)
आपका 
राहुल....... 

Friday, 16 November 2012

उत्सव, एक जरुरत




इन दिनों हम भारत-वर्ष के सबसे बड़े धार्मिक-उत्सव मनाने में डूबे है। दिवाली पर ढेरों शुभकामनाएँ देते हुए मन कर रहा है कि आज हम तलाशे कि आखिर हम उत्सव मनाते ही क्यूँ है? क्या महज श्रद्धा ही इन परम्पराओं का कारण है या कुछ और भी? और यदि है तो वे किस तरह हमारे जीवन को प्रभावित करती है?

उत्सव चाहे कोई हो उन दिनों एक खास माहौल बनने लगता है जैसे इन दिनों रामायण पर आधारित कई धारावाहिक आ रहे है तो ख़बरों में जगह-जगह होने वाली विशेष रामलीलाओं की चर्चा है, शहर में जगह-जगह रावण के पुतले बनते नज़र आ रहे थे तो घरों में सफ़ाईयाँ  चल रही थी। इस खास माहौल की बदौलत हमारे अवचेतन में कहीं न कहीं श्री राम और उनका जीवन रहने लगता है। पिता की आज्ञा-पालन कर राम का राज-पाट छोड़ना, सीता-लक्ष्मण का साथ वनवास जाना, भरत का खडाऊ रख शासन चलाना................. राम की रावण पर विजय। ये सारी घटनाएँ  उन मूल्यों की याद दिलाती है जिन्हें अपने जीवन का आधार बना एक राजा ईश्वर बन गया। ये हमें भरोसा दिलाती है कि आखिर विजय उसी की होती है जो सत्य की राह पर चलता है और इस तरह आम जन-जीवन में मूल्यों की पुर्नस्थापना करना किसी भी उत्सव को मनाने की सबसे अहम् वजह होती है।

एक और खास वजह, उत्सव हमें अवकाश देते है अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी से। लियानार्डो डी विन्ची लिखते है, 'अवकाश आपके निर्णयों को पक्का और पैना बनाते है।' सच ही तो है, रोजमर्रा की जिन्दगी ने हमें घड़ी से बाँध दिया है। अपने काम को सही समय पर करने के लिए हम समय-प्रबंधन करते है लेकिन धीरे-धीरे काम और उसकी गुणवत्ता कहीं पीछे छूट जाती है वैसे ही जैसे निश्चित समय पर भोजन करने की प्रतिबद्धता के चलते भूख का अहसास द्वितीय हो जाता है। उत्सव इस दुष्चक्र को तो तोड़ते है ही साथ ही हमें अवसर देते है जहाँ से खड़े होकर हम अपने काम को समग्रता से देख सकें। जिस प्रकार पहाड़ की चोटी पर खड़े होकर अपने ही शहर को देखने पर उसकी खूबसूरती और कमियाँ साफ़ नज़र आने लगती है उसी तरह अवकाश के दिनों से अपने काम को समग्रता से देखने पर हमें साफ़ नज़र आएगा कि हमारे काम में कहाँ अनुपात बिगड़ रहा है और कहाँ लय टूट रही है।

एक सबसे छोटा दिखने वाला लेकिन सबसे महत्वपूर्ण लाभ -- उत्सव हमें अपने रिश्तों की मरम्मत करने का अवसर देते है। शायद इसीलिए हर धार्मिक उत्सव के बाद चाहे वह दिवाली हो, होली हो, ईद हो या क्रिसमस ; अपने प्रियजनों से मिल उनका अभिवादन करने की प्रथा है। एक-दूसरे से मिलने और अभिवादन की यह रस्म अदायगी धीरे-धीरे रिश्तों के बीच आई दीवार ढहाने लगती है।

इस तरह उत्सव हमारे जीवन मूल्यों की पुर्नस्थापना करते है, काम की गुणवत्ता लौटते है, हमारे निर्णयों को पहले से ज्यादा पैना बनाते है और सबसे अव्वल हमारे रिश्तों की मिठास को बनाए रखते है। उत्सव श्रद्दा से कहीं अधिक हमारी जिन्दगी की जरुरत है। ईश्वर करें यह दिवाली हमारे जीवन को और बेहतर बनाएँ।


( रविवार 11, नवम्बर को नवज्योति में  प्रकाशित )
आपका 
राहुल................   

Friday, 9 November 2012

जिन्दगी के मौसम




प्रकृति से श्रेष्ठ कोई शिक्षक नहीं और इसके आश्चर्यों का आनन्द लेते हुए जीने से बड़ा कोई सुख नहीं। प्रकृति यानि बदलते मौसम। मौसम यानि जो कल था वो आज नहीं और जो आज है वो कल नहीं। निरंतरता की यही प्रवृति है प्रकृति की अद्वितीय सुन्दरता का राज। यही है हर सुबह की नई ताजगी और हर शाम की शीतलता की वजह। हमारे लिए ही गर्मियों के दिनों में सर्दी की कल्पना कर पाना कितना मुश्किल हो जाता है, इसी शिद्दत से जीती है प्रकृति अपने मौसमों को पर फिर धीरे-धीरे सर्दियाँ आने लगती है, कितनी सहजता से स्वीकार कर लेती है इस बदलाव को और उसी रंग-ढंग में ढल जाती है।

हम प्रकृति के इन रंगों के इतने अभ्यस्त हो चुके है कि इनसे सीखना तो दूर यह विविधता हमें आनंद-आश्चर्य भी नहीं देती। प्रकृति तो हर क्षण अपने आचरण से हमें याद दिलाती है कि जो कुछ जिओ उसे उस समय पूरी तरह डूबकर, कोई गिला बाकी न रहे लेकिन साथ ही यह भी याद रहे कि दुनिया में जिस किसी का भी अस्तित्व है तो उसके होने की वजह भी, तो जाने का समय भी। छोटी हो या बड़ी सबकी एक उम्र होती है लेकिन जिन क्षणों को भरपूर जिया हो उनकी विदाई आसान होती है। एक मौसम की सहज विदाई ही तो दुसरे मौसम के स्वागत का द्वार खोलती है और यही वो तरीका है जिससे हमारी जिन्दगी भी प्रकृति की तरह अद्वितीय सुंदर बन सकती है।

जिन्दगी के सबसे अहम् पहलू है हमारा काम और हमारे रिश्ते। दोनों के प्रति हमारा नज़रिया वही होना चाहिए जो प्रकृति का अपने मौसम के प्रति होता है। यह ठीक है कि हम वो करें जिसकी हमें दिल गवाही दे और तब काम, काम नहीं खेल बनकर रह जाएगा लेकिन कई बार हम व्यावहारिक कारणों के चलते अपने मनचाहे काम के अलावा किसी और काम में होते है या समय के साथ हमें अपना काम ही कम भाने लगता है। दोनों ही स्थितियों का जवाब प्रकृति में  छुपा है। पहले तो आप जिस भी काम में है उसे पूरे मन से कीजिए। पूरे मन से किया काम ही आपको सफलता देगा और यह सफलता ही आपको एक बार वापस अपने काम के चुनाव का अवसर देगी। मान लीजिए आप इंजिनियर है लेकिन चाहते है पेंटर बनना। सबसे पहले तो अपने मन में पेंटर बनने की इच्छा को जिन्दा रखते हुए इंजीनियरिंग के काम को अपना शत-प्रतिशत दीजिए। इंजीनियरिंग के क्षेत्र में आपकी सफलता आपको वो सब उपलब्ध करवाएगी जिससे आप अपने पेंटर बनने के सपनों को पूरा कर सकें, ठीक उसी तरह जिस तरह प्रकृति पूरी शिद्दत से हर मौसम को जीती है और यही अगले मौसम के आगमन का कारण बनाता है।

जिन्दगी का दूसरा अहम् पहलू है हमारे रिश्ते। किसी भी रिश्ते को तब भरपूर जियें जब आप उसमें हों, यही खुशियों भरे जीवन का राज है लेकिन हम या तो रिश्ते बनाने से पहले उत्साहित होते है या बाद में उन्हें याद करते है। रिश्तों को वर्तमान में जीते हुए भी जीवन में कई बार ऐसी स्थितियाँ बन जाती है कि उन्हें एक मोड़ दे देना ही एकमात्र विकल्प बचता है, तो इसमें कुछ गलत नहीं। आप ऐसा कर दोनों का भला ही कर रहे है लेकिन याद रहे न तो यह क्षणिक भावावेश हो और न ही बेहतर बेहतर रिश्ते की उम्मीद में उठाया कदम; यह स्थिर मन से अन्तरात्मा की आवाज़ पर किया निर्णय हो। किसी भी रिश्ते को महज इसलिए न निभाए कि यह आपका नैतिक दायित्व है वरना लोग क्या कहेंगे? रिश्ते जब कोरी जिम्मेदारी बन जाते है तो अपनी सुगंध खो देते है लेकिन अपनी जिम्मेदारी को नकारा भी नहीं जा सकता अतः रिश्तों को तब तक सहेजने की कोशिश करें जब तक उसमें आत्मिक ख़ुशी का एक भी रेशा बचा हो। एक बात ध्यान रखें रिश्ते परमात्मा का हमारा जीवन खुशियों से भर देने का साधन है लेकिन उसके पास साधनों की कोई कमी नहीं।

प्रकृति से मिली इसी सीख को श्री हरिवंश राय बच्चन ने बहुत ही सुन्दर और सार्थक शब्दों में पिरोया है, " पाप हो या पुण्य कुछ भी नहीं किया मैंने आधे-अधूरे मन से।"


(रविवार, 4 नवम्बर को दैनिक नवज्योति में  प्रकाशित)

आपका 
राहुल ........