Saturday, 12 September 2015

खिड़कियाँ खुली रखें







हम सब पुराने मित्र बहुत सालों बाद एक शादी में मिले। हम अपनी यादों को ताज़ा भी कर रहे थे और सभी आश्चर्यमिश्रित ख़ुशी से भरे हुए भी थे, ये देखकर कि हम सब अपनी-अपनी जिन्दगी में कहाँ-कहाँ पहुँच गए। हमारा एक मित्र हम सभी को लुभा रहा था, ऐसा लगता था कि वो बिल्कुल नहीं बदला। उसके बात करने का अंदाज़, उसकी भाव-भंगिमाएँ, सभी कुछ कॉलेज के दिनों की याद दिला रही थी लेकिन थोड़ी ही देर बाद उसकी बातों से सभी को उकताहट होने लगी। खुद ही को अच्छा नहीं लग रहा था कि मुझे ऐसा क्यों हो रहा है? आखिरकार दो दिनों बाद हम अपनी-अपनी जगहों को लौट गए। मैं भी लौट आया लेकिन मन में एक दुःख भरा सवाल लिए।

सवाल होता है तो उसका जवाब भी होता है बस उसे ढूँढना पड़ता है और जो मुझे मिला वह यह था कि मेरे उस दोस्त की बातों का मर्म भी वही था। शायद हम सब को ऐसा लग रहा था जैसे हम कॉलेज के ही किसी लड़के से बात कर रहे है। जैसे उसने अपनी मानसिकता को रोक लिया था, बाँध लिया था। जैसे उसने अपनी उन दिनों की सोच को ही अपना परिचय बना लिया था। इन सारे विचारों से यह सूत्र निकला कि जिस तरह कमरे की घुटन मिटानी हो तो कमरे की खिड़कियाँ खोलनी पड़ेंगी, उसी तरह खिले हुए व्यक्तित्व के लिए अपने दिल और दिमाग के दरवाजे खुले रखने होंगे।

आपको याद है दूसरी कक्षा में जब हमने पहली बार जोड़ लगाना सीखा था तब हम कैसे लगाते थे? जिसको जिससे जोड़ना होता, उतनी ही लाइनें बनाते और फिर उन्हें गिनते। वो सीखने का तरीका था जो हमारी उम्र के लिहाज से बिल्कुल ठीक भी था। धीरे-धीरे हमने अभ्यास किया फिर 'हासिल' लिखने लगे और फिर सीधे ही जोड़ने लगे। व्यक्ति को हर क्षण अपने आपको मांजने की कोशिश करनी चाहिए। जो कल का सच था वो आज का सच नहीं हो सकता। कोई भी साधन साध्य तक पहुँचने का जरिया भर होता है। पहली पायदान चाहे कितनी भी सुंदर हो उसकी उपयोगिता दूसरी पायदान पर पहुँचने तक ही सीमित होती है।
जिन्दगी से अच्छी कोई पाठशाला नहीं बशर्ते हम कक्षा में उपस्थित रहें। व्यक्तित्व निर्माण की पहली सीढ़ी है कि हम जिन्दगी के अनुभवों का प्रेक्षण करें, सोचें और चिंतन-मनन करें। ऐसा कर हम उन अनुभवों में छिपी सीख को जाने और आगे बढ़ जाएँ। नए विचारों को प्रवेश की अनुमति दें, उन्हें जानें और अपने परिप्रेक्ष्य में देखें-समझें फिर यदि ठीक लगे तो उन्हें आत्मसात करें; यही है अपने दिल और दिमाग के दरवाज़ों को खुला रखना।

इस सारे सन्दर्भ में मुझे महात्मा बुद्ध का वो सावधान करने वाला कथन याद आता है, "यदि कोई विचार सावधानीपूर्वक अन्वेषण के बाद उपयोगी लगता है और उसमें सभी का भला निहित है तब ही उसे स्वीकारें एवम अपनाएँ।" कोई भी विचार नया है सिर्फ इससे वह अपनाने लायक नहीं हो जाता। यदि वो जीवन के कारणों को संतुष्ट करता है याने उपयोगी है और जिसको अपनाने से कोई आहत  हो उसे ही थामे अन्यथा जैसे वह आया था वैसे ही उसे जाने दें।

Saturday, 5 September 2015

मिसिंग फेक्टर








सेन्ट्रल पार्क में बैठे एक दिन सुबह बातों ही बातों में शब्दों और अर्थों पर चर्चा चल पड़ी। एक दोस्त अलग-अलग शब्दों के शाब्दिक अर्थ बता रहे थे जैसे स्वार्थी वो जो स्व के अर्थ को जानता हो यानि अपने आपको जानता हो, षड्यंत्रकारी वो जिसे षड् यंत्रो का ज्ञान हो यानि जीवन की छह कलाओं में दक्ष हो। शब्दों को यूँ समझने में बड़ा मजा रहा था और आश्चर्य भी हो रहा था कि बेचारे हैं क्या और काम क्या आते हैं। काफी समय तक ये अर्थ मन में बने रहे कि और तब अचानक लगा कि चाहे कुछ भी हो ये सब बुद्धि-विलास के अलावा कुछ नहीं। क्या जो अपने को जानने की राह पर हो उसे हम स्वार्थी कह सकते है या जो जीवन को साध रहा हो उसे षड्यंत्रकारी? और तब अहसास हुआ कि भाव ही हैं जो शब्दों को वजूद देते हैं। बिना भावों के शब्द बारहखड़ी के अलावा कुछ नहीं। 
थोड़ी ही देर हुई कि ये अहसास विचारों और जिन्दगी को लेकर मेरी सोच को पुख्ता करते नजर आए।  


शब्दों से ही तो विचार बनते हैं और विचार ही हमारा जीवन बनाते हैं। बच्चे थे जब इसी बात को यूँ सुनते थे कि बेटा! ध्यान रखा करो, जाने कब सरस्वती जीभ पर बैठी हो। दोनों का मतलब एक ही है और ये बात है भी सोलह आने सच, पर यही कारण था कि धीरे-धीरे ये भी दूसरी अच्छी बातों की तरह साबित हो रही थी। ऐसी बात जो होनी तो चाहिए पर हो नहीं पाती। यही वजह थी कि इतने आसान तरीके के मालूम होते हुए भी हमें मनचाही जिन्दगी हासिल नहीं। 
यही था वो मिसिंग फेक्टर।  


बात भावों की ही थी; हमें अपने भाव, अपनी फ्रीक्वेंसी बदलनी होगी। ये विचार जिनसे हम अपने जीवन को सुन्दर बनाना चाहते हैं ये हमारे अन्दर से नहीं आते, इनमें हमारी आस्था नहीं होती। जैसेहम मानते नहीं कि हमारे समृद्ध होने पर विश्वास भर कर लेने से वैसी ही स्थितियाँ बनने लगेंगी और हम समृद्ध होंगे लेकिन चूँकि समृद्ध होने का लालच होता है इसलिए इसे जैसे-तैसे मानने की कोशिश करने लगते हैं यानि विचारों से भाव नदारद। थोड़ी स्थितियाँ विपरीत हुई नहीं कि वही ढाक के तीन पात; हम वैसे ही सोचने लगते हैं जैसे आज तक सोचते आये हैं इसीलिए जिन्दगी भी जैसी है वैसी ही बनी रहती है और विचारों से जीवन बनने की बात भी महज एक और अच्छी बात। 


जो मैं समझा, वो ये कि कुछ करना है तो सिर्फ अपने भावों पर काम करना होगा, इन्हें ट्यून करना होगा। सुन्दर भाव होंगे तो अच्छे विचार अन्दर से आयेंगे, वो जिनमें हमारी आस्था होगी और ये आस्था उन विचारों को हकीकत में बदल देगी।