Saturday, 29 November 2014

विश्वास के बीज, खुशियों की फसल



एक व्यक्ति अपने जीवन में जहाँ कहीं है वह अपने विचारों की बदौलत है और ये विचार, ये बनते हैं हमारे देखने-सुनने से। जैसा हम देखते-सुनते है वैसे ही विचार हमारे मन में बनने लगते है और फिर धीरे-धीरे उन पर यकीं होने लगता है। जिन विचारों पर हम यकीं करने लगते वे ज्यों के त्यों हमारे जीवन में घटने लगते है चाहे हम चाहें या न चाहें। 

कितना महत्वपूर्ण होता है हमारा देखना और सुनना, इस बात का और भी शिद्दत से अहसास हुआ जब मैंने डॉ. सुमोटो का चावल पर किए प्रयोग का वीडियो देखा। तब मैंने अपने चारों ओर नजर घुमाई तो पाया कि हम शायद ही ऐसा कुछ देख-सुन रहे हैं जो मन को सुकून पहुँचाने वाला हो। अब भला रोज ही झूठ-बेईमानी की कहानियों से घिरे रहेंगे तो अछाई पर यकीं भला क्यों कर होने लगा? हम इन लोगों को सफल मानने लगते है पर ऐसा है नहीं। हासिल इन्होंने चाहे जो कर लिया हो ये खुश नहीं हो सकते वैसे ही जैसे नमक डालने से हलवा कभी मीठा नहीं हो सकता। 

हमारे मन की बदहाली की वजह हमारे अपने विचार है जो हमने अविश्वास के बीजों को बोकर पाए हैं। मैंने सोचा क्यों न मैं रोजाना किसी ऐसी सच्ची घटना को आपके साथ साझा करूँ जी मन में विश्वास जगाती हो, कम शब्दों में उस लिंक के साथ जहाँ से मैंने उसे उठाया हो पर विश्वास बड़ा जगाती हो। विश्वास इस बात का कि अन्ततः अच्छा सिर्फ उनके साथ है अच्छाई को चुनते है। तब हमारे होने या न होने से फर्क पड़ने लगता है। 

तो आइए, facebook.com/dilsebyrahul पर, वहीं खुशियों की फसल के लिए विश्वास के बीज बोते हैं। 
(डॉ सुमोटो का वीडियो भी आप आज की पोस्ट में देख सकते हैं)

इंतजार में,
राहुल हेमराज ........  

Saturday, 15 November 2014

रौशनी की सौग़ात






जज्बातों का कोई धर्म नहीं होता, इसी को जी कर दिखाया मुधा पांडे गाँव के असलम बेग ने। मुधा पांडे गाँव रामपुर, उत्तर प्रदेश से कोई 10 कि.मी. पर है। आज से तक़रीबन 15 वर्ष पुरानी बात होगी, गाँव ही की यशोदा देवी के पति अचानक चल बसे। अर्थ जीवन की गाड़ी का ईंधन है। यशोदा देवी का जीवन भी ठहरने लगा। वे अपनी बूढी माँ और छोटे बेटे के साथ बड़ी ही दयनीय स्थिति में एक झोपड़ी में रहने लगी। गाँवों की यही तो ख़ास बात होती है कि यहाँ सब एक-दूसरे को जानते हैं। असलम बेग से ये सब देखा न गया। उन्होंने यशोदा देवी को अपनी राखी-बहन बना लिया।  

रिश्ता बनाना आसान है पर निभाना कोई असलम बेग से सीखे। सबसे पहले तो उन्होंने जरुरत के रुपयों-पैसों के साथ उनके लिए एक घर का इंतज़ाम किया। तब से ईद-दिवाली दोनों परिवार साथ मनाते, मुश्किल घडी में एक-दूसरे के साथ खड़े होते। यह भाई-बहन का परिवार था जिसके बीच दान या मदद नाम की कोई खाई न थी; एक बराबरी का रिश्ता। हर बार की तरह इस भाई दूज, 26 अक्टूबर'14 को भी असलम बेग अपनी बहन यशोदा देवी के यहाँ जाने को तैयार हो रहे थे कि खबर आयीं, वे नहीं रहीं। बात यहीं ख़त्म नहीं होती। वे भारी मन से अपनी बहन के यहाँ पहुंचे तो परिजन अन्तिम संस्कार की चर्चा कर रहे थे। सामान्य था वे गाँव ही के शमशान के बारे में सोच रहे थे लेकिन असलम भाई का विचार था कि वे अपनी बहन का संस्कार गंगा किनारे करें। वे अपने खर्चे पर सारे नाती-रिश्तेदारों के साथ अपनी बहन के पार्थिव शरीर को गंगा किनारे गढ़-मुक्तेश्वर लेकर पहुँचे जहां पूरी श्रद्धा के साथ अपनी बहन का अन्तिम संस्कार किया। 

उनके आपसी रिश्तों में धर्म कभी बीच में न आया। आना भी नहीं चाहिए क्योंकि धर्म आस्था का विषय है और आस्था निजता का। यह उतना ही निजी है जितना कि आज आप कौन से रंग का कपड़ा पहनना चुनते हैं या खाने में क्या लेना पसंद करते हैं। क्या हम किसी से बात करते हुए, व्यापार-व्यवहार या फिर दोस्ती करते हुए ये सब देखते हैं कि कोई क्या पहनता है या क्या खाता है तो उसका धर्म क्यों देखें? धर्म उस ऊर्जा तक पहुँचने का एक जरिया है जो हम सब के होने की वजह है, महत्वपूर्ण वह ऊर्जा है। क्या फर्क पड़ता है आपके कमरे में रोशनी बिजली के तारों से आती है, सौर-ऊर्जा के पैनल से या फिर गोबर-गैस के प्लान्ट से ही; महत्वपूर्ण है आपके कमरे का रौशन होना। ठीक इसी तरह महत्वपूर्ण है आपके अन्तस का रौशन होना चाहे वो जिस धर्म से होता हो। 

व्यक्तियों में भेद होना ही हो तो रौशन और बेरौशन का हो। रौशन वे जिन्हें हर क्षण याद रहे कि हम सब के होने की वजह एक है और बेरौशन वे जो अहं की गिरफ्त में एक-दूसरे से बेहतर सिद्ध करने जुगत में लगे हैं और तब ये जिम्मेदारी रौशन लोगों की हो जाती है कि वे किसी को अन्धकार में न जीने दें। रौशनी की ये सौग़ात जो इस दिवाली हमें असलम भाई और यशोदा देवी ने दी है, हमें सम्भाल कर रखनी है।


(दैनिक नवज्योति में 'सेकंड सण्डे' 9,नवम्बर को प्रकाशित)
राहुल हेमराज ..........

Saturday, 18 October 2014

ये हमें क्या होता जा रहा है?





अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली चिड़ियाघर में फोटो के फेर में एक युवक बाघ के पिंजरे में जा गिरा। आगे क्या हुआ ये न जाने आप कहाँ-कहाँ पढ़ चूके .......... लेकिन मेरा मन विचलित हो उठा यह देखकर कि वहाँ खड़े सब लोग अपने-अपने मोबाईल से फोटो और वीडियो क्लिप बनाने में लगे थे। शाम तक तो वो क्लिप सोशियल मीडिया पर वायरल हो चूकी थी। वहाँ खड़े इतने लोगों में से किसी ने इस ओर सोचा नहीं कि क्या किसी तरह इस युवक को बचाया भी जा सकता है? शायद सब अपनी शर्ट उतार कर एक रस्सी बना लेते या कुछ और। हम इतने संवेदनहीन कैसे हो सकते हैं? ये हमें क्या होता जा रहा है?

बारिश के दिनों में भी नदी के किनारे पिकनिक मनाते कुछ लोगों के दुर्भाग्यवश तेज बहाव में बह जाने के फोटो-वीडिओज़ इतने जल्दी आ जाते है जैसे खींचने वाले को पहले से मालूम था और वो इसीलिए वहाँ आया था। हमें बस फर्स्ट आना है, चर्चित रहना है और जीवन के हर क्षण में उन्माद की तलाश है। आइंस्टाइन ने ठीक ही कहा था, " मुझे डर है एक दिन तकनीक मानवीय सम्बन्धों पर हावी न हो जाए और ऐसा हुआ तो दुनिया में वह भोंदूओं की पीढ़ी होगी।" लगता है हर बार की तरह आइंस्टाइन इस बार भी सही सिद्ध हुए हैं। सामाजिक सरोकार तो छोड़िये, परिवार में भी जब कभी सब साथ बैठे होते हैं तब भी वे वहाँ नहीं होते। मोबाईल, जिसे में लानत कहता हूँ, के जरिए अपनी-अपनी दुनिया में रम रहे होते हैं। हर माता-पिता इस बीमारी से पीड़ित होते हुए भी चिंतित है कि कहीं यह बीमारी उनके बच्चों का भविष्य न लील जाए। 

कुछ समय पहले मैं 'क्रोध' के बारे में पढ़ रहा था, तब कई मनोवैज्ञानिक तरीकों के बारे में जाना जो अलग-अलग विशेषज्ञों ने सुझाए थे लेकिन मेरे गले एलन कोहेन का सुझाया मार्ग ही उतरा। वे कहते हैं, क्रोध को निकालने या दबाने की बजाए सबसे पहले उसे स्वीकार कीजिए और फिर कुछ ऐसा सोचने-करने की कोशिश कीजिए जो आपके मन को अच्छा लगता हो। हो सकता है, ऐसा कर पाने के लिए आपको अपने साथ थोड़ी जबरदस्ती करनी पड़े। इस तरह आप अपने मस्तिष्क पर पुनः काबू पा लेंगे और उस कारण को सही रूप में देख-समझ पाएंगे जो क्रोध की वजह बना और तब उसका इलाज कर पाना आपके लिए संभव होगा। 

ठीक ऐसे ही बच्चों को सारे दिन मोबाईल-टी.वी. के लिए टोकने और उनकी चौकीदारी करने की बजाए उन्हें ऐसे कामों के लिए प्रेरित और व्यस्त करने की कोशिश करनी चाहिए जहाँ उनकी संवेदनाएँ पुनः हरकत में आए। वे अपने दिन-सप्ताह में कुछ वक़्त उन जगहों पर गुजारें जहां वे दूसरों की भावनाओं को समझ सकें। जहां वे दुनिया की विविधता को देख सकें। हमारे बच्चे सोचने-समझने में तो हमसे आगे हैं ही, अगर हम इनकी संवेदनाओं के तारों को झंकृत कर पाए तो तकनीक कभी मानवीय संबंधों पर हावी न होने पाएगी और तब बाघ के पिंजरे में भी कोई अपने आपको अकेला नहीं पाएगा।  


(दैनिक नवज्योति में 'सेकंड सन्डे', 12 अक्टूबर को प्रकाशित)
राहुल हेमराज ............

Sunday, 21 September 2014

क्या न कि कैसे




उनके बारे में पता चला तो उस नेवले की कहानी याद हो आयी जिसका आधा शरीर स्वर्णिम था। महाभारत के बाद युधिष्ठिर ने प्रजा में सुख-शांति और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने राजसूय यज्ञ किया। आयोजन इतना भव्य और दान-दक्षिणा इतनी दी जा रही थी कि इसकी चर्चा पूरे आर्यावर्त में थी। इसी दौरान यह नेवला आया और यज्ञ की शांत राख में लोटने लगा। सभी आश्चर्य से देखने लगे। युधिष्ठिर ने थोड़ा क्रोधित होते हुए नेवले से पूछा तो वह बोला, मैं अपना बचा आधा शरीर भी स्वर्णिम करना चाहता था पर क्षमा करें, आपका दान शायद उतना महान नहीं।

युधिष्ठिर थोड़ा आहत हुए पर मन में जिज्ञासा भी उठी कि आखिर वो क्या था जिसकी महिमा इस राजसूय यज्ञ के दान से भी अधिक थी; तब नेवले ने बताया,- एक नेक ब्राह्मण दम्पति अपने बेटे-बहू के साथ रहते थे। बुरा समय किसकी जिंदगी में नहीं आता, एक दिन ऐसा भी आया जब उनके घर में केवल मुटठी भर चावल बचा था। उन्होंने उसे पकाया और सोचा, चलो एक समय का काम तो चल ही जाएगा, इतने में दरवाजे पर दस्तक हुई। देखा तो कोई वृद्ध राहगीर था। हालत इतनी दयनीय कि साफ़ जाहिर था कि वे कई दिनों से भूखे हैं। ब्राह्मण परिवार ने अपना सारा भोजन उन वृद्ध को करवाया और तब ईश्वर ने अपने वास्तविक स्वरुप में आकर उन्हें मोक्ष का वरदान दिया। मोक्ष है भी क्या मोह का क्षय ही तो है। 

नेवले ने कहा, संयोग से मैं भी उधर से गुजर रहा था कि उन चावल के दानों पर फिसल गया जो परोसते समय फर्श पर गिर गए थे। शरीर का आधा हिस्सा जो फर्श पर लगा स्वर्णिम हो गया, तब से भटक रहा हूँ कि कहीं उसके समकक्ष कोई दान हो रहा हो तो मैं अपने शरीर का आधा हिस्सा भी स्वर्णिम कर लूँ। लगता है राजन आपने भी दान नहीं अहंकार को ही पुष्ट किया है।

वे हैं 73-वर्षीय पालम कल्याणसुन्दरम्, तामिनलाडू की एक कॉलेज के लाइब्रेरियन। वे अब तक 30 करोड़ से अधिक की धनराशि गरीब और अनाथ बच्चों की मदद में लगा चूके हैं। लाइब्रेरी साइन्स में गोल्ड मेडल और साहित्य व इतिहास में स्नातकोत्तर के बाद लाइब्रेरियन के पद पर नियुक्ति के पहले दिन ही उन्होंने तय कर लिया था कि वे जिंदगी भर अपना पूरा वेतन गरीब-अनाथ बच्चों की मदद में लगा देंगे। वे अपनी गुजर-बसर के लिय पार्ट-टाइम करने लगे। यह सिलसिला उनके रिटायरमेंट के बाद भी जारी रहा। वे अपनी पूरी पेन्शन दान करते रहे और अपने लिए एक वेटर की नौकरी ढूँढ ली। यहाँ तक कि आजीवन अविवाहित रहे कि कहीं इनकी कमाई में कोई हिस्सेदारी न हो। 

आप कहेंगे, तो भी एक लाइब्रेरियन का वेतन और 30 करोड़ रुपये? आप ठीक कहते है, पर धीरे-धीरे इनके मिशन को पहचान मिलने लगी। भारत सरकार ने इन्हें 'सर्वश्रेष्ठ लाइब्रेरियन', इंटरनेशनल बायोग्राफ़िक सेंटर कैम्ब्रिज ने 'नोबलेस्ट ऑफ़ द वर्ल्ड', रोटरी क्लब ने 'मेन ऑफ़ मिलेनियम' और 'लाइफ टाइम सर्विस अवार्ड' से नवाजा तो यूनाइटेड नेशन्स ने इन्हें 20 वीं सदी का उत्कृष्ट व्यक्तित्व घोषित किया। इन पुरस्कारों की राशि 30 करोड़ हो गई और कहने की बात नहीं उन्होंने इसे भी बच्चों के लिए दान कर दिया।

हम अपने जीवन में किसी काम को शुरू ही तब करते है जब तक तार्किक रूप से यह न ठहरा लें कि वो हो सकता है या नहीं और यदि हो सकता है तो कैसे? क्या कल्याणसुन्दरम् को अपने पहले वेतन को देते समय यह मालूम था कि किसी दिन वे 30 करोड़ दान कर पाएँगे? उन्होंने ये भी नहीं सोचा होगा कि एक व्यक्ति के वेतन से बच्चों के जीवन पर कोई फर्क भी पड़ेगा, लेकिन आज वे हज़ारों बच्चों के जीवन को बेहतर बना पा रहे हैं। जरुरी सिर्फ यह है कि हमें अपने काम पर विश्वास हो और हम पूरी निष्ठा से उसे करते चले जाएं। 'कैसे' का भार प्रकृति पर छोड़ 'क्या' को अपने जीवन का केंद्र बनायें तो निश्चित ही ये दुनिया कहीं सुन्दर होगी। 



(दैनिक नवज्योति में रविवार, 14 सितम्बर को कॉलम 'सेकंड सन्डे' में प्रकाशित)
राहुल हेमराज ............ 



Sunday, 17 August 2014

सफलता का प्लेसमेन्ट






कुछ दिनों पहले मैं आर.डी.बर्मन पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री देख रहा था। एक ऐसा व्यक्ति जिसने फिल्म संगीत को बदल कर रख दिया। '70 और '80 के दशक की फ़िल्में यदि अपने मधुर संगीत के लिए याद रखी जाती है तो उसका एक कारण प्रमुख पंचम दा ही है। लोग प्यार और सम्मान में इसी नाम से उन्हें पुकारते थे। उनके सहायक मनोहारी सिंह और सपन चक्रवर्ती जैसे लोग रहे तो वाद्धकारों में हरी प्रसाद चौरसिया, शिवकुमार शर्मा, लुईस बैंक, भूपिन्दर और क्रेसी लॉर्ड जैसे लोग। 

331 फिल्मों में संगीत देने वाले इस विलक्षण व्यक्ति के जीवन में '80 के दशक के उत्तरार्ध से ऐसा बुरा समय आया जिसका अन्त पंचम दा से हमारे विछोह के साथ ही ख़त्म हुआ। लता मंगेशकर के शब्दों में, "ही डाइड़  टू यंग एण्ड टू अनहैप्पी।" ये एक ऐसा समय था तब एक के बाद एक उनकी 27 फ़िल्में फ्लॉप होती चलीं गई। वे जितना समेटने की कोशिश करते जीवन उतना ही बिखरता जा रहा था। किसी जीनियस के साथ ऐसा होता ही चला जाए, आखिर कोई तो वजह रही होगी? क्या उनसे कोई चूक हो रही थी या ये सिर्फ किस्मत ही थी? दुःख और आश्चर्य भरे मन से यही सब सोच रहा था की डॉक्यूमेंट्री के अन्त में विधु विनोद चोपड़ा आए। वे कहने लगे, '1942 - ए लव स्टोरी' के लिए पंचम ही मेरी पहली पसंद थे। मैं जानता था कि उनमें कितना अद्भुत संगीत था। गानों की पहली रिहर्सल में उन्होंने जो धुनें सुझाई वे वैसी ही पाश्चात्य ले पर थी जो '80 के दशक में उनका पर्याय बन चुकी थी। शायद वे सोचते थे सफलता का साथ जहां छूटा है वहीँ से वापस हो सकता है, शायद लोग मुझसे वही सब चाहते हैं। 

विनोद आगे कहते हैं, मैंने इस पर आपत्ति की और उन्हें अपने स्वाभाविक संगीत लिए प्रेरित किया। सफल और असफल होने से परे मैंने कहानी से गूँथ जाए ऐसे संगीत के लिए उन्हें छूट दी। मैं चाहता था कि कहानी सुन उनके अंदर से जो संगीत वही फिल्म के लिए माफिक होगा। फिल्म रिलीज के  नतीजा सबके सामने था, 1942 का संगीत 'सदी का मधुरतम' करार दिया गया। पंचम दा को अपना अंतिम और तीसरा फिल्मफेयर मिला लेकिन इसका दुःख हम सबको रहेगा कि इस खोयी सफलता को भोगने वे मौजूद नहीं थे। 

मेरे मन की गुत्थी सुलझ गई थी। वे अब तक सफलता को आगे रख कर उसे पुनः पाना चाहते थे। उनके काम को सफलता डिक्टेट कर रही थी। व्यक्ति अपना श्रेष्ठ तब ही दे सकता है जब वह काम स्वाभाविकता से करे। सफलता आपकी प्रेरणा रहे इसमें कोई ऐतराज नहीं लेकिन आपके काम और उसके तरीकों को वह तय करे तो यह केवल आपके असफल होने की गारंटी है। आप जब भी ऐसा करते है तब या तो किसी और की सफलता मापदण्ड होती है या बीते दिनों की सुनहरी यादें। आप भूल जाते हैं कि कोई और आप हैं नहीं और बीता समय हमेशा ही देश, काल और परिस्थितियों के सापेक्ष होता है। इस तरह आपका काम जिसे मैं आपकी अभिव्यक्ति कहना ज्यादा उपयुक्त समझता हूँ, सफलता को आकर्षित नहीं कर पाता, खिल नहीं पाता। 

सफलता काम के पीछे रहे तो ही अच्छा, जब-जब आगे रहती है हमें असफल बना देती है। आप वो करें, वैसे करें जिसमें सहज हैं, जो आपके लिए स्वाभाविक है। यही वो मंत्र है जो सफल तो बनता ही है सफलता को बरक़रार भी रखता है। 


(दैनिक नवज्योति में 'सेकंड संडे' 10 अगस्त को प्रकाशित)
राहुल हेमराज .............

    

Saturday, 19 July 2014

संस्कारों का बदलता दायरा






करीब दो महीने पहले की यह घटना होगी जब स्कूली बच्चों को ले जा रहे एक कोरियाई ज़हाज के डूबने की खबर आयी थी। ये बच्चे स्कूल की और से पास ही के एक टापू के लिए विनोद-यात्रा पर निकले थे। अचानक, न जाने क्या गड़बड़ी हुई कि ज़हाज में पानी भरने लगा। कुछ ही समय में यह जहाज डूब गया और इसमें क़रीब 300 बच्चों की जानें गई। तीन सौ बच्चे ......................... इसे बयाँ नहीं किया जा सकता। 

कुछ ही दिनों बाद बच्चों के मोबाइल में लिए उन दुख़द क्षणों के विडियोज़ सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे। इनमें जो कुछ भी था वो संस्कारों को पुनर्भाषित करने की माँग करता लग रहा था। मैं आपको बता दूँ, कोरियाई समाज पर कन्फ़यूशियस की शिक्षाओं का गहरा प्रभाव है। समाज का ताना-बाना उनके सिखाए मूल्यों से बुना है। जब जहाज में गड़बड़ी होना शुरू हुई तब उद्घोषणा हूई कि सभी यात्री लाइफ जैकेट पहन लें और अपने-अपने स्थानों पर बने रहें। अफरा-तफरी मचने से मुश्किलें बढ सकती है और हमारी अगली उद्घोषणा का इंतज़ार करे। विडियोज में साफ़ दिख रहा था कि बच्चे पहले अपने मित्रों को लाइफ जैकेट पकड़ा रहे थे, उसे पहनने में उनकी मदद कर रहे थे और फिर मुस्तैद हो, अगली घोषणा का इंतज़ार करने लगे। 

और 'बड़े', चाहे वे चालक दल के सदस्य हों, स्कुल के वरिष्ठ अध्यापक या अन्य सहयात्री; उन्होंने क्या किया? जहाज में पानी भरना शुरू होने के कुछ ही मिनटों बाद सब भूल-भालकर अपनी-अपनी जान बचाने की जुगाड़ में जुट गए। वे दूसरी उद्घोषणा करना ही भूल गए और बच्चे इंतज़ार ही करते रह गए। बच्चे तब भी बने रहे अपने-अपने केबिन में, लाइफ जैकेट पहने हुए। उनकी मूल्यों में आस्था इतनी अटूट थी कि वे सोच ही नहीं पाए कि ऐसा भी हो सकता है। जीवन के प्रश्न के समय भी व मूल्यों को, संस्कारों को निभाते रहे और नतीज़ा हुआ -- बहुत बुरा, लोमहर्षक। 

इस घटना ने दिल को दुःख से तो भर ही दिया पर साथ ही यह प्रश्न भी खडा कर दिया कि क्या आज के बदलते सामाजिक परिदृश्य में संस्कारो को भी पुर्नसंतुलित और पुर्नपरिभाषित करने की जरुरत नहीं है? जब मानवीय रिश्तों और सम्बन्धों का स्वरुप इतना बदल गया हो तब संस्कार भी वैसी ही अनुरूपता क्यों न लें? 'बड़ों का कहना मानना चाहिए' - ये बात हमेशा ही खरी रहेगी लेकिन समय के साथ कौन 'बड़े' इस दायरे में शेष रह गए है और कौन बाहर निकल गए हैं,- यह विवेक तो हमें अपने बच्चों को देना ही होगा। बच्चों को शिष्ट और अनुशासित बनाना एक बात हैं ओर उन्हें समय से पीछे रखना दूसरी बात। जीवन के अधिकांश भाग का व्यवसायीकरण एक वीभत्स सच्चाई है और इस वीभत्सतता से अपने बच्चों को दूर रखना हमारा प्रेम लेकिन क्या हम ऐसा कर बहुत बड़ी जोखिम नहीं उठा रहे हैं? इस घटना से तो ऐसा ही लगता है। 

अपने चारों ओर भी नज़र घूमाकर देखें तो भी कुछ-कुछ ऐसा ही नज़र आता है। इन बच्चों को अधिकांशतः वे ही नुकसान पहुँचा रहे हैं जिन्हें ये बहुत आदर और सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। निश्चित ही, संस्कार हमेशा ही अनुकरणीय रहेंगे लेकिन इन्हें बदलते दायरों के सन्दर्भों में समझना और तब उन्हें भावी पीढ़ी को सौंपना होगा। आप कह सकते हैं कि इस तरह बच्चों की मासूमियत छीनने की बजाए हमें समाज में अंधाधुंध बढते व्यवसायीकरण को रोकने की कोशिश करनी चाहिए। शायद आप ठीक कहते हैं। हमें ऐसा ही करना चाहिए था लेकिन आज जो समाज का चित्र है वो इतना बिगड़ चूका हैं कि उसे रातों-रात ठीक कर पाना भी तो सम्भव नहीं। निश्चित ही हमें इस ओर भी काम शुरु कर देना चाहिए। इस व्यवसायीकरण ने हमारे जीवन का रस-सुगन्ध छीन लिया है जिसे लौटाना एक लम्बी प्रक्रिया है लेकिन तब तक हम अपने बच्चों को बीहड़ में अकेला तो नहीं छोङ सकते? आप ही बताइए, क्या कोई संस्कार, शिक्षा, मूल्य या धर्म अपने मूल स्वरुप में रह पाएगा यदि वह जीवन को अधिक सुन्दर न बनाता हो? यदि उसमें सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् की आत्मा न हो? 


(दैनिक नवज्योति में 13 जुलाई को 'सेकंड सन्डे' कॉलम में प्रकाशित)
राहुल हेमराज ........

Friday, 13 June 2014

पार्टी विद द भूतनाथ






एक फिल्म देखी थी, 'भूतनाथ' ; पुरानी वाली। इसका एक दृश्य रह-रहकर मेरे जेहन में कौंधता रहा है। फिल्म में केंद्रीय पात्र कैलाशनाथ एक भूत हैं जिनके घर में एक नौ-दस वर्षीय नटखट बंकू और उसका परिवार किराए पर रहने आते हैं। बंकू के पिता नेवी में काम करते हैं इसलिए विदेश यात्रा पर हैं। घर में बचे; बंकू, उसकी मम्मी और कैलाशनाथ। कैलाशनाथ नहीं चाहते कि उनके घर में कोई और रहे इसलिए पहले ही दिन से वे उन्हें डराने की कोशिश करते है लेकिन हो इसका उलटा जाता है। बंकू उनके दिल में बस जाता है, वे उसे अपने पोते की तरह प्यार करने लगते है; इतना कि वे तय कर लेते हैं कि अब बंकू यहीं रहेगा, कहीं नहीं जाएगा और कहानी आगे बढने लगती है ........... ।

जिस दृश्य की मैं बात कर रहा हूँ, वो कुछ इस तरह है कि बंकू का पैर सीढ़ियों पर से फिसल जाता है। उस समय कैलाशनाथ उसके साथ होते है। वे उसे थामने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाते है, उनका हाथ वहाँ तक पहुँच भी जाता है लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाते। वे भूत जो ठहरे, उनका होना-उनकी आकृति महज आभासी होती है। सामने होते हुए कुछ न कर पाने की विवशता। यह विवशता-यह असहायपन इतना बखूबी कैलाशनाथ के चेहरे पर आता है कि दृश्य से जुड़ जाओ तो आपको अंदर तक झकझोर देता है। मुझे लगा, हर किसी के जीवन में ऐसे क्षण जरूर आते है जिनका अफ़सोस ता-जिंदगी बना रहता है कि काश! मैं कुछ कर पाता।

यह अहसास जब गहरे उतरा तो लगा कि साधारण सी दिखने वाली बात कितनी असाधारण थी। हम अपने मूल स्वरुप में भूतनाथ की तरह ही होंगे। हमारी कोई इच्छा ही रही होगी जो इतनी घनीभूत हो गई कि उसने भौतिक आकार ले लिया वैसे ही जैसे मीठा पानी धागे से लिपट मिसरी बन जाता है। यही वजह रही होगी हमारे होने की, मानव के जन्म की जिसे हर धर्म और अध्यात्म ने अलग-अलग तरीकों से यह कह कर पुष्ट किया है कि प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय है और वह कुछ विशेष करने आता जिसे उसके सिवाय कोई नहीं कर सकता।

प्रश्न उठता है, क्या हम उस इच्छा-उस भावना के प्रति सजग है? क्या हमने कभी जानने की कोशिश की है कि वो कौन-सी बात है जिसे करने मैं आया हूँ? कौन-सी ऐसी बात है जिसे  अपनी आँखों के सामने होते या नहीं होते नहीं देख सकता? क्या है जो मैं कहना चाहता हूँ? ऐसे ही प्रश्नों से मुठभेड़ ने फिल्म के उस दृश्य को इतने वर्षों तक मेरे जेहन में जिन्दा रखा। मुझे लगता है हम में से अधिकांश लोगों की हालत उस भुलक्कड़ व्यक्ति जैसी है जो अपने घर से कुछ सामान लेने निकलता है और कहीं भूल न जाए इसलिए रास्ते भर दोहराता है। रास्ते में दो-तीन परिचित उसे टोक देते है और जब वो दुकान पहुँचता है वो सामान क्या से क्या हो चुका होता है। दूसरों को देख, उनकी राय सुन या सुख-सुविधाओं के लालच की टोका-टोकी के चलते यह बिसरा बैठे है कि हम यहां आए किसलिए थे? 

मुझे मालूम है, आप क्या कह रहे है? यही ना, कि कहने-सुनने में ये बात ठीक लगती है लेकिन मालूम कैसे चले कि व्यक्ति यहाँ आया क्यों है? ये मुश्किल वास्तव में जितनी बड़ी दिखती है उतनी है नहीं। आप बस इस टोका-टोकी से अपने आपको अलग कर लीजिए। सुनिए सबकी करिये अपने मन की; अपने अंतर्मन की। आप जैसे-जैसे अपनी सुनने की कोशिश करने लगेंगे, आपके सामने साफ़ होता चला जाएगा, उस भूतनाथ की ही तरह कि कौन-सा ऐसा काम है जिसे आप अपने सामने होते या नहीं होते नहीं देख सकते और तब आपको जीवन का मक़सद मिल जाएगा, जीने का सच्चा आनन्द आने लगेगा। 
सो, लेट्स पार्टी विद द भूतनाथ एण्ड एन्जॉय योरसेल्फ।

 

(दैनिक नवज्योति में रविवार, 8 जून को कॉलम 'सेकंड सन्डे' में प्रकाशित) 
राहुल हेमराज